वापसी की टिकट

जब हम इस संसार में आते हैं तो हमारे वापिस जाने के समय का आदेश लेकर ही आते हैं । चाहे हम इसे महसूस करें या न करें, हम सभी वापसी की टिकट ले कर ही आए हैं । अब सवाल उठता है कि हमारी अगली मंज़िल कौन सी है, और कितने ‘बैंक बैलेंस’ के साथ हम जाऐंगे?
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हम अक्सर अपना जीवन ऐसे जीते हैं जैसे कि हम यहाँ हमेंशा के लिए रहने वाले हैं, इसलिए शायद हम अपनी विरासत पर अधिक ध्यान नहीं देते । हालाँकि, इस संसार में हम सभी मेहमान हैं । जब कोई बहुत अच्छा मेहमान होता हैं, तो जिस स्थान पर वह आया है उसे उस स्थान का सम्मान करना होता है, जब तक वहाँ हैं तो वहाँ का आनंद लें, और जिस अवस्था में हमें वह मिला था उससे खराब हाल में छोड़ कर नहीं जाना ।
‘मेहमान’ का अर्थ है कि कुछ भी हमारा नहीं है, और आध्यात्मिक दृष्टि से इसका अर्थ है कि कुछ स्तर की निर्लिप्तता का अभ्यास किया जाऐ । जब हम कोई होलीडे होम किराये पर लेते हैं तो आशा करते हैं कि हमारे लिए सारी सुविधाऐं मौजूद रहें जैसे बर्तन, तौलिए, भोजन से सम्बन्धित सुविधाऐं आदि । जब हम छोड़ कर जाते हैं तो हम यह नहीं कहते कि मुझे इन चीज़ों को साथ ले जाना है! हम समझते हैं कि ये सभी वस्तुऐं इस घर की हैं, और हर चीज़ जिस अच्छी हालत में मिली थी उसी हालत में छोड़ कर जानी पड़ेगी । यही बात आत्मा पर भी लागू होती है, संसार में यह एक मेहमान है, और एक दिन हमें सब कुछ पीछे छोड़ कर जाना होगा, ‘जितना हो सके उतने अच्छे हाल में’ ।

एक अच्छे मेहमान का अर्थ है कि हमें जाने से पहले अपने अधूरे कार्य निपटाने होंगे । होलीडे होम के मेहमान की तरह हमें अपने जाने की तरीख नहीं मालूम, इसलिए हमें साथ साथ ही सब काम निपटाते चलना है । इसका अर्थ है ‘कूड़े’ को बहुत बार फेंकना है और विशेषकर सम्बन्धों में सब कुछ व्यवस्थित करते चलें ।
कभी कभी शब्दों से झगड़े नहीं सुलझते, लेकिन प्रेम और हल्केपन से निश्चित ही सुलझाऐ जा सकते हैं । हमें अपने 50% या उससे अधिक की ज़िम्मेवारी लेनी होगी, तभी ‘हिसाब-किताब’ चुक्तू होगा । अगर हम दूसरों को लगातार अपने मन की अवस्था के लिए या अपने हाल के लिए ज़िम्मेवार ठहरा रहे हैं तो असल में हिसाब चुक्तू करने के स्थान पर हम नया हिसाब बना रहे हैं । ईमानदान रहें और जो कर्मों का जाल आपने बुन लिया है उसे स्वीकार करें, और स्वयं को देखने की हिम्मत रखें कि कौन से सुधार की आवश्यकता है ।
हल्के रहें । जितना हो सके उतना कम वस्तुओं को पकड़ कर रखें और तनाव से दूर रहें । जीवन के सफर में हल्के रहिऐ और अगर हमारे पास अधिक वज़न नहीं है तो प्रस्थान के समय तनाव नहीं होगा ।
अगर हमें अधिक मोह नहीं है तो हम स्वयं को बहुत से दुख और परेशानियों से बचा सकते हैं । मानसिक आसक्ति को जाने दें – जों चीज़ें हमें बाँध सकती हैं, नहीं तो हम अधूरे कार्य को पूरा नहीं कर पाऐंगे! ‘कोई आसक्ति नहीं’ का अर्थ है हम हल्के, शांत और सदैव तैयार रहें ।
हम अक्सर कार्बन पदचिन्ह के बारे में सुनते हैं, लेकिन आत्मिक पदचिन्ह का क्या? इस संसार में हम कौन सी छाप छोड़ रहे हैं?

जब हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि इस संसार में हमारे पास गिनती का समय है तो इससे ही कुछ अच्छा यादगार छोड़ने की प्रेरणा आनी चाहिए । हम सब चाहेंगे कि हमारे पीछे से लोग हमें प्रेम से याद करें, एक उत्कृष्ट गुणों वाले, मूल्यों वाले और सत्यनिष्ठ व्यक्ति के रूप में । हम संसार में अपनी सकारात्मक छाप छोड़ना चाहेंगे इसके लिए हमें प्रतिदन को दूसरों के लिए आदर्श बनाना पड़ेगा ।
‘वापसी की टिकट’ क अर्थ है कि हमें जागरूक रहना है कि इस तन में हम हमेंशा नहीं रहेंगे । जब हम यात्रा करते हैं तो प्रस्थान की तारीख सदा हमारे मन में रहती है और हम अपनी खरीरददारी और दृश्यावलोकन के कार्यक्रम उसी के इर्दगिर्द बनाते हैं । फिर भी हमारे मन में सदा यह बात घुमती रहती है कि कभी घर वापिस भी जाना है । हमें तारीख का ना भी मालूम हो, लेकिन हमें मानसिक रूप से तैयार रहना होगा ।
तो स्वयं से पूछें, आप कहाँ जा रहे हो, आपकी अगली मज़िल कहाँ है? सामान्यत: अगर हमारी मंज़िल सूर्यवत अर्थात गर्म मौसम वाली है तो हम हल्की चीज़े पैक करते हैं, अगर ग्रीनलैंड है तो आप ऊनी कपड़े लेंगे । फिर भी अगर हमें कोई ख्याल है कि अपने मौत के बाद हम क्या आकर्षित करना चाहेंगे, तो हमें उसी हिसाब से अब ‘पैकिंग’ आरम्भ कर देनी है ।

बदलाव हमेशा अच्छा है । याद रखें, यह बेहतर रहेगा कि हम यहाँ भी रहें और वहाँ भी! इसलिए मौत को असामान्य घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए । मान लें कि अगर आप ऐसे देखने का चयन करें और अपना मन इसमें लगा दें तो सब कुछ केवल एक अपूर्व अनुभव है ।
अब समय है… वापसी की टिकट को याद करने का । सब कुछ पीछे अच्छे हालत में छोड़कर जाने के लिए तैयार रहें, और स्वयं को भी तैयार कर लें । क्या आप आगे के अपूर्व अनुभवों के लिए तैयार हैं?!
© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK
