क्या धर्मराज सच में डंडा लेकर बैठा है?
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इंग्लैंड में बड़ी होते हुए, मुझे इस बात पर कभी विश्वास नहीं हुआ कि भगवान कोई दाढ़ी वाला बूढ़ा शक्स है जो बादलों के पार रहता है और मुझे कुछ गलत करते हुए पकड़ने के लिए तैयार बैठा है । और जैसे ही मैने कुछ ग़लत किया तो आसमान से एक शक्तिशाली कानफोडू आवाज़ आऐगी, ‘पकड़ लिया !’ और फिर उसके लकड़ी के बड़े डंडे से पिटाई होगी । किसी भी कार्यक्षेत्र में, डराकर वश में करना प्रोत्साहित करने का बेहतरीन तरीका नहीं है, और मुझे यह बहुत अविश्वसनीय लगा कि सर्वशक्तिवान को ऐसी डराने वाली युक्तिओं का सहारा लेना पड़ता होगा ।
Audio in English of ‘Is God Really Holding a Stick Up There?’
(Music by Cafe Del Maar – Volumen Trece II)
‘द डे ऑफ जजमेंट’ या ‘फैंसले का दिन’ का उल्लेख तकरीबन प्रत्येक धर्म में है । यह एक ऐसा विषय है जिस पर बात करना हमें पसंद नहीं है और यह भी निश्चित है कि किसी की भी इस बात पर सही पकड़ नहीं है कि आखिर उस दिन होगा क्या । यह कहना उपयुक्त होगा कि एक समय आऐगा जब हमें अपने कर्मों के लिए जवाब देना होगा और अपने कर्मों के अनुसार ही हमें फल मिलेगा या नहीं । हाँ, यह निश्चित है कि हम अपने कर्मों के लिए जिम्मेवार हैं, लेकिन क्या सच में हमें भगवान सज़ा देते हैं?
मेरी राय में (और शायद मेरी पसंद भी यही है) यद्यपि निश्चित रूप से अंत में एक फैसले का दिन आऐगा जब हमें अपना बही खाता परमात्मा को देना पड़ेगा, लेकिन अभी भी हम छोटे छोटे जुर्माने भरते रहते हैं । क्या हमें डर और आशा के साथ अंतिम दिन का इंतज़ार करना पड़ेगा, जब हमें मालूम पड़ेगा कि हमने लॉटरी हारी है या जीती है? या एक सूक्ष्म जीपीएस सिस्टम है जो हमें निरंतर फीडबैक दे रहा है?
अंतिम दिन को एक तरफ रख दें, इसी पल में अपनी खुशी गंवाने से बड़ी कोई सजा नहीं हो सकती । गल्तियां करने की पीड़ा और छोटे छोटे ऋणों को चुकाने के लिए बाध्य होना, यह हमारी आंतरिक मार्गदर्शन व्यवस्था है जो हमारी उन्नति करने में सहायक है । खुशी खोने के साथ हम अपनी निर्णय शक्ति भी खो देते हैं, हम अपनी स्पष्टता भी खो देते हैं; यह समन्व्यता या शांति या प्रेम या करूणा आदि के नियमों का उल्लंघन करने का परिणाम होता है ।
आध्यात्मिक नियमों को तोड़ने का ऑटोमेटिक और स्वाभाविक परिणाम ‘सजा’ है । जब हम बुरे कर्मों द्वारा अपनी खुशी गंवा देते हैं, हमारी अंतरात्मा व्यथित हो जाती है तब हम आंतरिक शांति को पाने का पुन: प्रयास करते हैं । यह अच्छी बात है कि प्रत्येक दिन हमें आंतरिक स्थाई मार्गदर्शन प्राप्त होता रहता है, इसे हमें मार्ग से भटकने से बचाने के लिए नियुक्त किया गया है । लेकिन यह काम तभी करेगा जब हम अपने मित्र और विवेक- आंतरिक आवाज़ का ख्याल रखेंगे ।
अगर कोई अपने आंतरिक मार्गदर्शन का सहारा नहीं ले पातें हैं तो इसका अर्थ है कि वे उल्टे रास्ते पर बहुत दूर तक चले गऐं हैं, उनका ज़मीर मर गया है और यह बहुत गंभीर अवस्था है । ज़मीर या अन्तरात्मा के नहीं होने का अर्थ है अपनी आत्मा को सुधारने में और अपने आध्यात्मिक बैंक के खाते को संतुलित करने में उन्हें बहुत मेहनत लगेगी ।
उस दिन की ओर जाने की यात्रा के दौरान, अगर हम अपने कर्मों के परिणाम को अनुभव कर रहें हैं तो इसका अर्थ है कि आत्मा अपनी वास्तविक पवित्र अवस्था, जब स्लेट साफ थी, की ओर जाने के लिए उत्सुक है । उदाहरार्थ, अगर हमारे शरीर में दर्द नहीं है तो हमें यह मालूम नहीं पड़ेगा कि कहीं खास ध्यान देने की आवश्यकता है । इसी प्रकार आत्मा की पीड़ा हमारा ध्यान इस ओर खिंचवाती है कि आत्मा में सफाई की, ठीक करने की, सुव्यवस्थित करने की आवश्यकता कहां है । किसी कानून – भौतिक या आध्यात्मिक, में यह नहीं लिखा कि हम अपने कर्मों की ज़िम्मेवारी लिए बिना,जो कुछ करना चाहें वह करके बच के नहीं जा सकते । यह बात तो पक्की है कि वह दिन आऐगा जब न्याय होगा, ‘धरती पर जैसे स्वर्ग में’ (ईसाइ धर्म) । इसलिए भगवान को सर्वोच्च न्यायधीश (धर्मराज) के रूप में भी याद किया गया है । चाहे अपने अंतिम क्षणों में ही सही परन्तु ऐसा क्यों है कि संसार की प्रत्येक आत्मा अपने जीवन काल में कम से कम एक बार भगवान को याद अवश्य करती है? क्योंकि सर्वोच्च न्यायधीश, धर्मराज हमारे सामने एक आईने के समान प्रकट होते हैं ताकि हम उनके सम्मुख स्वयं का आकलन कर सकें । केवल न्यायसंगत या ईमानदार ही हमारी गल्तियों को हमें बता सकता है । और हो सकता है तब ऐसा हो कि हमें गहरा पश्चाताप हो कि हमने पहले ध्यान क्यों नहीं दिया ।
पवित्र कुरान में उल्लेख है “…वह दिन जब उनकी ज़बान, उनके हाथ और उनके पैर उनके कर्मों के खिलाफ गवाही देंगे” । वह दिन होगा जब सबके सामने सब कुछ प्रत्यक्ष हो जाऐगा और आत्मा की पीड़ा ही यर्थाथ परिणाम या सजा होगी ।
‘संतोष्जनक’ जजमेंट डे अनुभव करने का एकमात्र तरीका है मैं हमेंशा अच्छा ही करती रहूँ; और प्रत्येक लम्हा उपयुक्त और न्यायसंगत तरीके से बिताया जाऐ । मुझे विश्वास नहीं होता कि भगवान हमें हमारे विकारों के लिए दोषी ठहराते हैं क्योंकि हम इसी समय उसकी पीड़ा सहन करते हैं । वह हमें दोषी करार देते हैं- हमारी सर्वोच्च पराकाष्ठा पर पहुँचने का प्रयास न करने के लिए और हम क्या प्राप्त कर सकते हैं वह न जानने के लिए(जो वह जानता है) । मेरा मानना है कि अंत में हमारा सबसे बड़ा दुख न केवल इस बात का होगा कि हमने दूसरों को दुख पहुँचाया बल्कि इस बात का भी होगा कि हमने अपनी आत्मा के सर्वोच्च संभावनाओं के अनुकुल जीवन व्यतीत नहीं किया । प्रत्येक आत्मा में दैवी गुण और शक्तियाँ हैं । यह सबसे बड़ा पश्चाताप होगा कि जब मैं प्रेम कर सकती थी तो नहीं किया, जब मैं आदर दे सकती थी तो मैंने आदर नहीं दिया, जब मैं उदातापूर्वक दे सकती थी तब मैंने नहीं दिया, मैंने अपनी शक्तियों का प्रयोग सही प्रकार से नहीं किया, मैंने अपनी वास्तविकता से जीवन व्यतीत नहीं किया । परमात्मा प्रेम का सागर है । वह हमें प्रेम से समझाते हैं और अगर हम नहीं सुनते तो उसका परिणाम होता है ।
अब समय है … अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को सुनने का और अपनी गल्तियों से सीखने का । इसे बहुत देर तक बिना ध्यान दिये नहीं छोड़ें । परमात्मा प्रेम का सागर है । वह हमें जीवन के नियम सिखातें हैं और अगर हम उनकी ओर ध्यान नहीं देते तो हमेशा ही उसका परिणाम होता है ।
English Meditation Commentary – ‘Ocean of Love’ (Music by Cafe Del Maar – Volumen Trece II)
© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK