अग्निशामक

आग बुझाने वाले प्रशंसनीय व्यक्ति होते हैं । जब वे आग लगने वाले स्थान पर पहुँचते हैं तो कभी सवाल नहीं करते कि आग कैसे लगी या किसने लगाई । बस वे अपने काम पे लग जाते हैं ।
जंगल की आग तो अनियंत्रित ढंग से जड़ों में भूमिगत फैलती है । यह अक्सर एक जगह शुरू होकर कुछ ही मिनटों में धधक कर दूर तक फैल जाती है ।
यही बात हमारी भावनाओं के लिए भी सत्य है । हम किसी बात पर आंतरिक रूप से प्रतिक्रिया करते हैं और बाद में…. विस्फोट कहीं और होता है । जब हम अपने आवेश को दबा कर रखते हैं, उदाहण के लिए क्रोध, ये भड़क कर अलग रूप में प्रकट होता है, परिस्थिति को बिगाड़ देता है, क्योंकि हम प्रत्युत्तर देने के स्थान पर प्रतिक्रिया करते हैं । वास्तव में बिना नियंत्रण और अभिव्यक्ति के सामाजिक नियमों के हमारी भावनाऐं ऐसे ही हैं जैसे बिना आवरण के अंडा; बस चिपचिपा और अस्तव्यस्त । इसलिए भावनाओं को अपने में निहित रखना आवश्यक है लेकिन उनको सुनना भी ज़रूरी है ।
एक अग्निशामक सीखता है कि आग को काबू कैसे पाना है; वह निर्धारित करता है कि किस प्रकार की प्रतिक्रिया आवश्यक है (रसायन बनाम जल), और फिर आग बुझाने की ओर आगे बढ़ता है । हमारे लिए, हमारी भावनाओं के संदर्भ में, हमें उनको पृथक करना सीखना चाहिए, उनको एक ऊर्जा के रूप में देखें जो ना नकारात्मक है और ना सकारात्मक है और फिर उस ऊर्जा को फायदे के लिए और जितना हो सके नुकसान रोकने के लिए प्रवाहित करें । नकारात्मक भावनाओं की आग को बुझाना एक बहुत बड़ा काम लगता है लेकिन धैर्यता से, दृढ़ता से, क्षमा करने से और हिम्मत से हम उनको निष्प्रभाव (नियंत्रित) और रूपांतरित (आग बुझाना) कर सकते हैं ।
भावनाऐं हमारे बारे में बहुत कुछ बताती हैं । ई-मोशन अर्थात गतिवान ऊर्जा । एक ऊर्जा जिसका मेरी आंतरिक गहरी सत्यता के साथ एकत्रीकरण नहीं है और तालमेल ठीक बैठता नज़र नहीं आता और हम इसे ‘भावुक होना’ कहते हैं । हमने भय, क्रोध या वैमनस्य की नकारात्मकता से प्रतिक्रिया की है । हम शांति की निर्मल भावना को हर पल महसूस कर सकते हैं । बाहर की बातों पर प्रतिक्रिया करने के स्थान पर अगर हम अपनी शांति की ऊर्जा से जुड़ जाते हैं तो चाहे कितनी भी भयावह या गर्म परिस्थिति हो हम उसपर ठंडा पानी डाल सकते हैं ।
अब समय है… अपने अंदर की और आसपास की आग के बारे में जागरूक होने का – और स्वस्थ, सकारात्मक मन की अवस्था को अग्निशामक के रूप में सदा साथ रखने का । एक सकारात्मक मन अंदर उठ रही भावनाओं को स्वीकार करेगा और उस ऊर्जा को सकारात्मक दिशा की ओर प्रवाहित करेगा । सबसे अच्छा तो है मेडिटेशन से अपने अंदर आंतरिक शांति का गहरा कुँआ खोद कर अग्नि रोधक बन जाना । शायद तभी हम सही मायने में नेकदिल कहलाऐ जाऐंगे क्योंकि तब किसी भूमिगत आग का खतरा नहीं रहेगा!
© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK
