परेशान या शूरवीर? (Worrier or Warrior? – In Hindi)

परेशान या शूरवीर

क्या आप जानते हैं कि चिंता करना एक बिमारी है । हाँ, यह सच में एक बीमारी है! इसके लिए कोई दवाई या औषधि नहीं है, लेकिन इससे तनाव और चिंता पैदा होती है । चिंता करने से दूसरी बड़ी बीमारीयाँ भी हो जाती हैं जैसे दिल की बीमारी, पाचन तंत्र और फेफड़ों की बीमारी । कुछ लोग मानते हैं कि अगर वे बहुत चिंता करेंगे तो वे चिंता को दूर भगा देंगे । सच्चाई से दूर कोई नहीं भाग सकता । कुछ लोग इस अभिव्यक्ति का प्रयोग करते हैं “मैं चिंता करते करते मर भी सकती/सकता हूँ” । जो कुछ भी आप सोच रहे हैं ज़रा सम्भलकर!

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हफींगस्टन पोस्ट के एक लेख का सार इस प्रकार है । “पाँच सौ वर्ष पूर्व माईकल डे मोन्टेगन ने कहा है: “मेरा जीवन बहुत कठोर विपत्तियों से भरा हुआ था; जिसमें से बहुत सी विपत्तियाँ आयी ही नहीं” । अब एक अध्ययन ने इस बात को साबित कर दिया है । इस अध्ययन ने इस बात पर चर्चा की कि हमारी कितनी सारी काल्पनिक दुर्घटनाऐं कभी घटी ही नहीं । इस अध्ययन में लोगों को एक निश्चित अवधि के दौरान उनकी चिंताओं को लिखने के लिए कहा गया और फिर उन दुर्घटनाओं को पहचानने के लिए कहा गया जो वास्तव में घटी ही नहीं । आश्चर्य की बात यह हुई कि 85 प्रतिशत बातें जिनसे लोग चिंतित थे वे कभी हुई ही नहीं, और 15 प्रतिशत जो घटनाऐं घटी उनमें, 79 प्रतिशत लोगों ने पाया कि या तो वे उस परिस्थिति को अपेक्षा से कहीं बेहतर तरीके से संभाल पाऐ, या उस मुश्किल की घड़ी ने उन्हें वह पाठ सिखाया जो सीखना अति आवश्यक था । इसका अर्थ है कि जिस बात की आप चिंता करते हैं उसका 97 प्रतिशत भाग केवल यही है कि आपका चिंतित मन अतिशयोक्ति से और ग़लतफहमी से आपको सज़ा देता है ।”

अगर इस बारे में हम विचार करें तो, अगर हम अपनी कल्पना को आज़ाद कर दें तो चिंता करने के लिए तो बहुत कुछ है । हम एक ऊँची इमारत में प्रवेश करें तो चिंता हो सकती है कि कहीं यह हमारे सिर पर ना गिर जाए । हमें स्विच के शॉर्ट सर्किट होने की चिंता हो सकती है । हमें हमारे भोजन में कीटनाशकों का ज़हर मिले होने की चिंता हो सकती है । या फिर हमारे कपड़े धोने की मशीन जब 1400 आरपीएम की गति से घूम रही है तब उसके दरवाज़े का हमारे मुँह पर खुलने का डर हो सकता है… यह सूची अन्तहीन है ।

हम चिंता क्यों करते हैं?

हमारी चिंता के अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन उन सबका आधार अंतर्निहित भय और असुरक्षा की भावना है । असुरक्षित महसूस करने के कई कारण हो सकते हैं, शायद भूतकाल में हमें किसी ने अकेला छोड़ दिया हो, या धोखा दिया हो और हमें डर है कि वह सब कुछ दोबारा ना हो जाऐ; हो सकता है पर्याप्त धन और सुख सुविधाऐं ना होने का भय हो, या स्वयं में ही असुरक्षा, अर्थात स्वयं को अयोग्य समझना इसलिए आत्म-विश्वास की कमी होना ।

शायद दूसरी सबसे बड़ी चिंता है मरने की । हरेक को इससे गुज़रना है लेकिन फिर भी कुछ लोग इसका स्वागत करते हैं और कुछ इसके बारे में चिंता करने में अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं । मौत के बारे में चिंता करने में अपना जीवन व्यर्थ नहीं करें ।

अपनी चिंताओं के रचता हम स्वयं ही हैं, जब हम अपने पूर्णतावादी नज़रिये के कारण, स्वयं अपने आप से और दूसरों से ऊँची अपेक्षाऐं रखने लगते हैं । अपने स्तर को थोड़ा नीचे करें और अपने आसपास की बातों के प्रति थोड़ा और स्वीकार्यता की वृत्ति अपनाऐं । अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो आप स्वयं को ही तकलीफ़ पहुँचा रहे हैं ।

अस्वीकृति का डर या यूँ कहें स्वीकार्य नहीं किया, यह भी सूची में बहुत उँचे स्थान पर है । हम योग्य होने और सुंदर दिखने की इतनी चिंता करते हैं कि इससे हमारी सारी शक्ति व्यर्थ चली जाती है । इससे हमारा स्वाभिमान कम हो जाता है और कुछ प्रेम और अनुराग पाने के लिए हम वह बनना आरंभ कर देते हैं जो हम नहीं हैं । इस बात को स्वीकार कर लें कि आप जैसे हैं बहुत बेहतर हैं!

ध्यानी और योगी लोग भी चिंता से अछूते नहीं हैं! कुछ को चिंता होती है कि हम ठीक भी कर रहे हैं या नहीं, या क्या कोई और तरीका है या ज्ञानोदय का कोई सरल उपाय है! कोई बात नहीं, ध्यान लगाते रहिऐ ।

उपाय

परेशान होने के बजाय शूरवीर बनिऐ । एक शूरवीर बहुत बहादुर होता है और अपने दुशमन का सामना करने में घबराता नहीं है । अगर हम अपनी चिंताओं के बारे में ही सोचते रहे और चिंता करते रहे तो वे हमारे मन में बढ़ती जाऐंगी । अगर हम उनको समझ के नऐ नेत्रों से देखें तो हो सकता है कि 97% को हम अपने मन से जाने देंगे ।

अगर हमने पर्याप्त तैयारी की है तो भी हम चिंता नहीं करेंगे । यह बात, शादी करने से लेकर मौत तक, विद्यालय की परीक्षाओं से लेकर आध्यात्मिक उन्नति तक, हर क्षेत्र में लागू होती है । कर्मों का सिद्धांत हमें बताता है कि अगर हमारे पास अच्छे कर्मों का खाता जमा है तो हमें अपने भविष्य की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है । जिन्होंने कोई पुरूषार्थ नहीं किया है उन्हें चिंता होगी ।

 

अनावश्यक चिंता से बचने का एक और उपाय है ‘कार्य को अभी कर लेना’, जिसका अर्थ है जो कार्य आपको चिंता दे रहा है उसे आप जितना जल्दी हो सके समाप्त कर दें, टालमटोल नहीं करें जिससे आपके चिंता करने का समय बढ़ जाऐगा! यह हर बात पर लागू नहीं होता लेकिन एक बार फिर अग्रसक्रिय बनें ।

चिंता करने के स्थान पर जो आप चाहते हैं उसका आहवान करें । जिस बात को आप चाहते हैं उससे सम्बन्धित विचार विश्व में भेजें ना कि उन विचारों को जो आप नहीं चाहते । शुभ कामनाओं के विचार भेजें । आशावादी और सकारात्मक रहिए । इस तरीके से हम वह पाते हैं जो हम चाहते हैं ।

जब भी कोई मुश्किल या बाधा डालने वाली परिस्थिति सामने आती है तो विस्मयादिबोधक चिन्ह के स्थान पर पूर्ण विराम लगाऐं! बातें जितनी बड़ी हैं उन्हें उससे बड़ा नहीं बनाऐं ।

आप किस बात की चिंता करते हो? इसके बारे में विचार करें । क्या यह उचित है? या यह पूर्णतया अविवेकपूर्ण है? क्या ऐसा कुछ है जो इस बारे में आप कर पाऐं? चिंता को दबाऐं नहीं और ऐसे ढोंग नहीं करें कि आपको चिंता नहीं है । इसको समझें और अनिवार्य कदम उठाऐं । अग्रसक्रिय बनें । चिंता को कार्यवाही में बदल दें ।

अब समय है… शूरवीर बनने का ।

 

 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

 

 

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