उपवास

रमज़ान के पवित्र महिने में उपवास करना करोड़ों लोगों के लिए अनिवार्य होता है । रमज़ान एक वार्षिक आध्यात्मिक उत्सव है जो समस्त मुसलमान परिवार को जोड़ता है । लेकिन उपवास को आध्यात्मिक उत्थान के साधन के रूप में समर्थन करना केवल इस्लाम में ही नहीं है ।
अधिकतर धर्म जैसे ईसाइ, बहाई, यहूदी, हिन्दू, जैन, मोरमोनिज्म, टाओ और भी बहुत, ये सब भी कुछ समय के लिए परहेज़ करने का समर्थन करते हैं, चाहे सभी खाद्य पदार्थों से या कुछ खास प्रकार के खाद्य पदार्थों से । धूम्रपान और मदिरापान और दूसरे मादक पदार्थों का सेवन भी वर्जित होता है ।
उपवास करने के समय शरीर को बहुत फायदा होता है: कहा जाता है कि यह शरीर का विषहरण करता है और समस्त सेहत में भी सुधार लाता है । फिर भी, बहुत गहरा और अधिक महत्व का पहलू है आध्यात्मिक प्राप्तियाँ । यह तो निश्चित है कि उपवास करना केवल कुछ परहेज़ करने तक सीमित नहीं है, इसे ऊँची चेतना के मार्ग के रूप में जाना गया है । हम आध्यात्मिक शक्ति के लिए, किसी विशेष लक्ष्य या उद्देश्य के लिए, परमात्मा को और बेहतर जानने के लिए और मनुष्य के स्वभाव पर फिर से प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए उपवास कर सकते हैं ।

उपवास का उद्देश्य कष्ट उठाना नहीं है लेकिन पेटूपन से रक्षा करने का है, और झूठ बोलने, धोखा देने, अनियंत्रित काम विकार और इच्छाओं और अपवित्र तथा अभद्र विचारों, शब्दों और कर्मों से परहेज़ करने का है । उपवास हमारे अहंकार को भी कम कर देता है और दूसरों के अभाव के जीवन को हमें याद करा कर हमारी नम्रता का पोषण करता है । अक्सर यह समय है यात्रा को और अपने परिवार, जिनके साथ हम जीवन यात्रा पर चल रहे हैं उनके साथ मिलकर उत्सव मनाने का । उपवास का भाग यह भी है कि, कुछ मज़हब प्रोत्सहित करते हैं कि उपवास करने से जो धन बचा वह दान में देना चाहिए और प्रेम और दया की भावना से गरीब लोगों की मदद करना चाहिए ।
सभी धर्मों में उपवास के दौरान मंशा पर अधिक ध्यान देने का भी महत्व है । किसी भी कार्य के पीछे मंशा सदा सकारात्मक होनी चाहिए । अपनी मंशा को जाँचने का अर्थ है अपने हृदय को जाँचना । क्या मेरा हृदय इतना साफ और स्वच्छ है जो इसमें परमात्मा वास कर सके? क्या मैं निस्वार्थ हूँ या बदले में कुछ पाने की या पहचान पाने की अपेक्षा है, यह हमारे अच्छे कर्म को कमज़ोर कर देगा?
एक मुसलमान के लिए उपवास अनिवार्य भी है और अल्लाह के प्रति प्रेम जताने का तरीका भी है जिससे उसे तक़वा मिलता है और हृदय और आत्मा की शुद्धि होती है । यह स्व-नियंत्रण और अनुशासन को उत्पन्न करता है और एकता और संयुक्तता की भावना को बढ़ाता है ।
बहुत सी ईसाइ धर्म की परम्पराओं में उपवास करना अति आवश्यक है: आमतौर पर कई उद्देश्यों के लिए बहुत से दिन निर्धारित किये जाते हैं । मूसा, इलीजाह और स्वयं ईसाह मसीह ने 40 दिन का उपवास रखा था । ईसाह मसीह ने शैतान के प्रलोभनों से स्वयं को बचाया था, और इस घटना से ही ईसाइ धर्म में 40 दिन के उपवास की करने की प्रेरणा मिली ।
बौद्ध धर्म में साधु और साधवियाँ विनाया नियम का पालन करते हैं और प्रतिदिन दोपहर के बाद कुछ नहीं खाते । उपवास के बजाय यह एक नियम है जो मेडिटेशन और अच्छी सेहत के लिए फायदेमंद है ।

उपवास करना हिन्दू धर्म का अविभाज्य अंग है । बहुत से कारणों से लोग उपवास रखते हैं: धार्मिक त्यौहारों के और उत्सवों के दौरान, किसी विशेष देवता के सम्मान में, या जन्म या मृत्यु । धन और वैभव के लिए, या अच्छा पति पाने की चाहना में । यह रूचिकर है कि हिन्दू श्रावण के पूरे मास उपवास रखते हैं ।
प्रतिदिन अति और नकारात्मक विचारों से उपवास रखने का नियम बनाने से निश्चित रूप से स्वस्थ मन का विकास होगा, प्रार्थना या मेडिटेशन में सुधार लाऐगा और हमारे जीवन को बदल देगा । हम सब बहुत अधिक विप्लव के समय से गुज़र रहे हैं और हमारे भीतर के विकारों के विस्फोट से हमारे अंदर खलबली और अस्तव्यस्तता है और बाहर बॉम्ब के धमाके हैं! यह वही निर्णायक समय है जिसमें मानवता को संसार के परिदृश्य में शांति जोड़ने की आवश्यकता है । विकारों, जो कि संसार की हर समस्या की जड़ हैं, को समाप्त करने का सही तरीका है कि हम उनकी शक्ति छीन लें अर्थात उनको प्रयोग न करें ।
जब हम उपवास रखते हैं तो उस शांत और समरसता के समय में हमें हमारे जीवने की आम उत्कृष्टता पर विचार करने का अवसर मिलता है । यह मेरे जीवन के कम्पास की जाँच करने का और मेरी स्वयं की दिशा निश्चित करने का एक मांगलिक और उपयुक्त समय है । क्या मैं अपने उद्देश्य के अनुसार जीवन व्यतीत कर रहा हूँ? ‘उपवास’ के इन दिनों के बिना हम सही अर्थों में अपने मन और तन को शक्तिशाली नहीं बना सकेंगे या संसार की प्रत्येक अच्छाई की सराहना नहीं कर सकेंगे ।

उपवास एक अनुशासन है, लेकिन यह देह दंड या तपस्या नहीं है । हमें यह बताने के लिए कि जीवन में कुछ भी आसानी से हासिल नहीं होता यह एक जाँचा परखा उपाय है और मेहनत और बलिदान से हम स्वयं के मालिक बन सकते हैं ।
अब समय है… स्वाद से उपर उठ कर अपने इस अंग को अंतराल या ब्रेक देने का । अपने आंतरिक कंपास के बारे में विचार कर इस अवसर का लाभ उठाऐं । अपने कर्मों के पीछे अपनी मंशा की जाँच करें, क्या यह सकारात्मक है? और जब ‘उपवास तोड़ने’ का समय आता है तो अपने मन और आत्मा और शरीर को, फिर से सकारात्मक, शांत और कल्याणकारी विचारों, शब्दों और कर्मों से पोषित करने के प्रति सचेत होकर करें ।
© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

कृपया बताने का कष्ट करें कि उपवास कब और कितने दिन के बाद करना चाहिए।
आपके प्रश्न के लिए धन्यवाद । राजयोग मेडिटेशन में शारीरिक उपवास को महत्व नहीं दिया जाता । लेकिन हाँ, यहां हम बुराईयों से स्वयं को बचाने का उपवास या व्रत या दृढ़ संकल्प प्रतिदिन करते हैं तो इस प्रकार का उपवास हर रोज़ कर सकते हैं । जिससे जीवन में निश्चित रूप से सुख शांति का आगमन होगा ।