सभी मांओं को समर्पित! – Dedicated to all Mums (in Hindi)

सभी मांओं को समर्पित!

प्रत्येक मां विशेष होती है

चाहे कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा हो जाए, चाहे वह कोई वीआईपी बन जाए या अरबपति बन जाए, माताओं को हमेंशा ही मालूम होगा कि अपने बच्चे को कैसे ठीक करें । माताओं का हमारे दिल में बहुत विशेष स्थान होता है । उनके बलिदान को मापा नहीं जा सकता और केवल उनका प्रेम ही इस ग्रह पर बेशर्त के सबसे करीब है ।

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मेरी माँ का देहान्त 22 जनवरी 2002 को हुआ था । वह बहुत प्यारी थी और मुझे मेरे गलत होते हुए भी प्रेम करती थी! मेरी उनसे इतनी आसक्ति थी कि मैं सोचती कि संसार से इनके जाने के बाद मेरा क्या होगा! उनके अंतिम संस्कार और बाद तक भी मैं बहुत मज़बूत बनी रही, लेकिन बाद में मैंने महसूस किया कि ऐसा इसलिए हुआ कि उन्होंने हमें ऐसा बनाया था ।

उन्हें सदा ही अल्पव्ययी रहना पसंद था; वह शरीर के तकरीबन प्रत्येक हिस्से के लिए यार्डले की वैसलीन प्रयोग करती थी! अपने हाथों के लिए, पैरों और चेहरे के लिए, मेरा विश्वास करें कि उनका चेहरा सबसे कोमल और साफ़ था । अपने बालों के लिए वह नारियल का तेल प्रयोग में लाती थी । वह हमेंशा शैंपू, कन्डीशनर और साबून को किफायती रूप से प्रयोग करने के लिए हमें याद दिलवाती रहती थी! बाद में मैंने महसूस किया कि ऐसा इसलिए नहीं था कि हमारे पास कोई कमी थी लेकिन इसलिए ताकि हम प्रत्येक वस्तु का आदर करना सीखें, कोई भी चीज़ व्यर्थ न करें ।

आज तक भी मैं समझ नहीं पाती हूँ कि मेरे पिता के एक वेतन से मेरी माँ ने कैसे घर चलाया । हमेंशा ही भोजन प्रचुर मात्रा में होता था और बहुत से मेहमान आते रहते थे, फिर भी हम सात भाई-बहनों ने कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं की । कम से कम हम में से कोई भी ‘कमी’ की स्मृति से बड़ा नहीं हुआ । जब मेरी बड़ी बहन की शादी होने वाली थी तो मुझे याद है कि मैं अपनी माँ, पिता जी और बहन के साथ बहुत भारी सोने के हार, कानों की बालियाँ और चूड़ियाँ खरीदने सुनार की दुकान पर गई थी! उसने पैसे कैसे बचाए? आज के दिन दोनों ही अभिभावक कमाते हैं और फिर भी एक बच्चे के साथ भी घर नहीं चला सकते हैं!

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि हम सभी बच्चों को मूल्यों और नैतिकता से बड़ा किया गया था । भाग्य की बात है कि सभी भाई बहनें आज तक भी खुश हैं, जो शादीशुदा हैं वे अपनी ग्रहस्थी में बहुत खुश हैं और धनी हैं, और अगली पीढ़ी भी अपने बच्चों को पाल पोस कर बड़ा कर रही है!

बहुत सी ऐसी बातें हैं जो माँऐं हमें कहती हैं जो उस समय हमें पसंद नहीं आती । फिर भी समझदारी की वे शिक्षाऐं बाद में काम आती हैं, विशेषकर तब जब हम अपना परिवार शुरू करते हैं । तभी हमें उन हिदायतों की कीमत का पता चलता है । तो युवा पीढ़ी को मैं कहूँगी कि चाहे आपका अहंकार कहे कि आपको बेहतर मालूम है तो भी बस सुनो । “क्योंकि माँऐं अक्सर सही होती हैं!”

माँ अपने बच्चे को कभी उदास नहीं देखना चाहती । अगर उसके बस में है तो वह दुख दूर कर देगी । अगर आप को कुछ हो जाता है तो माँ सदा आपके साथ खड़ी होगी । वह घर में हर किसी का दर्द उठाती है! रोब जमाने वाले पिता का, असंतुष्ट सास का, आलसी ससुर का, अभिमानी सबसे बड़े का, और दूसरे वाक्छल बच्चों का ।

माँऐं आपको हमेशा ऐसा महसूस कराऐंगी कि आप अप्रतिम हो! सभी बच्चों को लगेगा कि वे अपने माँ के आँख के तारे हैं । किसी तरह माँ को पता चल जाता है कि किसे क्या चाहिए और उसे वही चीज़ उपलब्ध करा देती है जिससे उन्हें बहुत विशेष और महत्वपूर्ण महसूस होता है ।

एक माँ को पता है कि उसे अपने बच्चे की कमियों को छिपाना है । वह किसी को भी अपने बच्चें की कमियों के बारे में बात नहीं करेगी । अगर वह किसी को ऐसी बातें करता सुनेंगी भी तो उन्हें बीच में रोक देगी या विषय बदल देगी ।

इसलिए माँऐं इस धरा पर फरिश्ते की तरह हैं, चाहे कुछ भी हो जाऐ सदा ही हमारा भला चाहेंगी और हमारा मार्गदर्शन करेंगी! एक बार उनकी मातृत्व का कर्तव्य आरम्भ हो जाता है तो वह मरने के दिन तक समाप्त नहीं होता!

यहाँ मातृत्व पर एक बहुत रोचक दृष्टिकोण है (लेखक अंजान)

“मैं एक माँ हूँ”

ड्राईविंग लाईसेंस काऊंटर पर अफसर ने महिला से पूछा, “आप क्या काम करती हँ?” जो महिला अपना लाईसेंस नवीकृत करवाने आई थी वह थोड़ी उलझन में दिखी ।

तो फिर अफसर ने कहा, “मैंडम, क्या आप काम करती हैं… आपका अपना बिज़नेस या …”

महिला ने कहा, “हाँ हाँ!! मैं पूरा समय काम पर हूँ । मैं एक माँ हूँ”

अफसर: “हमारे पास ‘माँ’ के कार्य के लिए कोई विकल्प नहीं है । मैं ‘ग्रहिणी’ लिख देता हूँ । इसमें सभी सवाल आ जाऐंगे ।”

यह बहुत पहले हुआ था और मैं भूल गई थी ।

बहुत सालों बाद जब मैं अपना लाईसेंस लेने गई, पब्लिक रिलेशन अफसर एक शानदार महिला थी ।

“आपका पेशा?” उसने बहुत अधिकारपूर्वक लहज़े से पूछा ।

मुझे एक प्रेरणा आई और मैंने जवाब दिया, “मैं बच्चों के विकास, पोषण और आपसी सम्बन्धों की अनुसंधानकर्ता हूँ ।”

महिला अफसर ने बड़े अचरज से मेरी ओर देखा ।

मैंने शान्ति से अपना वाक्य दोहराया और उसने शब्दश: वही बात लिख दी ।

फिर अपने कोतूहल को वह छिपा नहीं पाई, और नम्रता से पूछा, “आप अपने पेशे में वास्तव में क्या करती हो, मैडम?”

मैं अपने पेशे का इतनी शांती और आत्मविश्वास के साथ वर्णन करके बहुत खुश थी, “मेरा अनुसंधान प्रोजेक्ट बहुत सालों से चल रहा है (माँ कभी सेवा-निवृत नहीं होती) । मेरा अनुसंधान प्रयोगशाला में और बाहर क्षेत्र पर भी चलता है । मेरे दो बॉस हैं । (एक भगवान और दूसरा सारा परिवार) । इस क्षेत्र में दो सम्मान मिले हैं (एक बेटा और एक बेटी) । समाज शास्त्र में मेरा विषय सबसे मुश्किल माना जाता है (सभी माँऐं सहमत होंगी!!)! मुझे प्रतिदिन 14 घंटे से अधिक काम करना पड़ता है । कभी कभी तो 24 घंटे भी कम पड़ जाते हैं और दूसरे पेशों से चुनौतियाँ बहुत कठिन हैं । मेरा पुरस्कार पैसे के बदले मानसिक संतुष्टता के रूप में मिलता है ।”

मैंने देखा कि महिला अफसर पूरी तर‍ह से प्रभावित हो चुकी थी । लाईसेंस की औपचारिकताऐं समाप्त करने के बाद वह मुझे दरवाज़े तक छोड़ने आई ।

घर वापस जाते समय अपने पेशे के बारे में नए नज़रिये के बारे में सोचकर मैं बहुत खुश थी ।

दरवाजे़ पर मेरा स्वागत मेरे 5 वर्षीय अनुसंधान सहायक ने किया । मेरा नया प्रोजैक्ट (मेरा 6 महिने का बच्चा) भरपूर ऊर्जा से अपने ‘संगीत’ का अभ्यास कर रहा था ।

आज मैंने सरकार की दफ़तरशाही में थोड़ी विजय हासिल कर ली थी । मैं आज “केवल माँ” नहीं थी । बल्कि, अब मैं मानवता की महत्वपूर्ण सेवा में एक ऊँच स्थापित अधिकारी थी – मातृत्व!!

‘माँ’ कितना महान ओहदा है । दरवाज़े की तख्ती पर लिखने लायक!!

इस स्तर से तो दादियों को वरिष्ठ अनुसंधान अफसर कहना ठीक होगा, और परदादियों को ‘अनुसंधान डायरेक्टर’ । आंटियाँ और इसी उम्र की दूसरी महिलाओं को ‘अनुसंधान सहायक’ कहना ठीक रहेगा ।

 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

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