विघ्न या सुअवसर? (Obstacles or Opportunities?)

विघ्न या सुअवसर

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विघ्न वह वस्तु है जो मेरी मंज़िल को पाने की राह में बाधा उत्पन्न करे । ‍फिर भी, दूसरी तरफ कई बार हमने अनुभव किया है कि हमें राह में रोकने के स्थान पर विघ्न हमें हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक पहुँचा देते हैं ।

चाहे भौतिक बाधाऐं और शिलाखंड हमारे मार्ग में आऐं, या चाहे मानसिक और भावनात्मक बाधाऐं, किसी को भी विघ्न पसंद नहीं आते । जब वे आते हैं तो निराशा और मायूसी उत्पन्न करते हैं जिससे हमारी ऊर्जा समाप्त हो जाती है ।

विघ्न और समस्याओं का अर्थ है कि हमें अतिरिक्त कार्य करना पड़ता है, चाहे भौतिक या आंतरिक कार्य । हम जबरदस्ती अपने आरामदायक क्षेत्र से बाहर आने के लिए बाध्य हो जाते हैं, फैसले करने के लिए और नऐ निर्णय लेने के लिए हम गहराई से देखने के लिए मजबूर हो जाते हैं । हमें अतिरिक्त कार्य करना पड़ता है । लेकिन, हम स्वयं से पूछ सकते हैं कि इस अतिरिक्त कार्य करने में गलत क्या है? क्या अपने आरामदायक क्षेत्र से कभी कभी बाहर आना अच्छी बात नहीं है? और यह सारा एक सकारात्मक अनुभव क्यों नहीं हो?

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दूसरे दृष्टिकोण से, विघ्न एक वरदान भी हो सकता है । मुख्य बात है सही वृत्ति बनाऐ रखना; शांत रहना और विश्वास रखना कि सब अच्छा ही होगा । अगर हम एक ही ढर्रे में अटक जाते हैं और आगे बढ़ने की चाहना नहीं रखते तो नयापन कहां है और विकास कहां है? हम वार्षिक जन्मदिन मनाते होंगे, लेकिन आध्यात्मिक विकास कहां है?

जब विघ्न या मुश्किल परिस्थितियां आती हैं तो, पहले उनका फौरन विरोध करने के बजाय हमें उन्हें जीवन के सबक के रूप में स्वीकारना होगा । उनसे डरो मत । अगर आप उनसे डरेंगे तो वह आपको नियंत्रित कर लेंगे । यह स्वीकृति बोझ को तुरन्त आधा कर देगी । अगर हम लड़ेंगे और चिल्लाऐंगे तो ऐसा करने से सबक सीखना मुश्किल हो जाता है ।

असल में, हाल ही में अपने जीवन में एक निर्णय पर पहुँची हूँ कि वास्तविक विघ्न ‘बाहर’ नहीं हैं, बल्कि असली विघ्न मेरे ही भीतर हैं । मैं अपना सबसे बड़ा शत्रु बन जाता हूँ जब मैं मुद्दा जैसा है उसे वैसा देखने से इन्कार कर देता हूँ, जब मैं नकारात्मक चिंतन जारी रखता हूँ या जब मैं परिवर्तन के लिए इन्कार कर देता हूँ; जब मैं ज़िम्मेवारी उठाने के बजाय दूसरों पर इल्ज़ाम लगाता हूँ । अगर मैं इन सब कारणों को बदलने के लिए राज़ी हो जाता हूँ तो विघ्न निश्चित ही वरदान और सुअवसर बन जाऐंगे,जो मुझे नए और शायद अधिक रोचक क्षितिज पर ले जाऐंगे ।

कभी-कभी लोग अपने मन में एक लक्ष्य रखकर आरम्भ करते हैं और जब उस लक्ष्य का मार्ग अवरूध है तो वे हिम्मत हार जाते हैं, अपने लक्ष्य को छोटा कर देते हैं, या अपनी दिशा की समझ खो देते हैं । आप इसे क्या कहेंगे? डरपोक बनना, हार मान लेना, घुटने टेक देना? या क्या यह सम्भ्व है कि विघ्नों को ड्रामा में परीक्षा के रूप में देखें कि आप किसी वस्तु को कितनी दृढ़ता से चाहते हैं, और आप आपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए कितना तैयार है?

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अगर अपने मार्ग में किसी बाधा के कारण आप अपना मार्ग बदल देते हैं तो आप कहेंगे कि आपने लक्ष्य तो रखा है लेकिन सिर्फ रास्ता बदल दिया है । ऐसा हो सकता है, लेकिन फिर भी आप अपने आरंभिक मार्ग पर क्यूँ चलना नहीं चाहते? क्योंकि जब हम ऐसा करते हैं , और जब हम बाधा को पार कर लेते हैं तो हम अगले स्तर पर पहुँच जाते हैं, और इसके परिणामस्वरूप सशक्त अनुभव करेंगे ।

मुख्य बात है अव्यवस्थता के बीच में शांत और स्थिर रहना । अगर हम अपने विघ्नों के क्या और कब और कैसे के चक्रवात में फंस गए तो सवालों की पंक्ति कभी समाप्त नहीं होगी बल्कि यह बढ़ती ही जाऐगी । मन बहुत व्यस्त और बिखरा हुआ हो जाऐगा, और एक अस्थिर मन कभी आत्मविश्वासी निर्णय नहीं ले सकता । व्याकुल मन में इतनी शक्ति नहीं होगी कि वह विघ्नों से पार देख सके और उस पल में विकसित हो रही दूसरी सम्भावनाओं की सुन्दरता की सराहना कर सके ।

जब मैं सकारात्मक विचार उत्पन्न करती हूँ तो मैं भीतर से बहुत स्थिर और शांत रहती हूँ, फिर मैं परिस्थिति के पृथक्क घटक नहीं बल्कि के समस्त आयाम को देख सकती हूँ । फिर मैं सही अर्थों में देख पाती हूँ कि जो कुछ मेरे सामने झटित हो रहा है उसमें क्या फायदा है? विघ्न शायद मेरी कर रहा है, मेरा मार्ग दर्शन कर रहा है, मुझे कुछ नया दिखा रहा है, मुझे कुछ बेहतर प्रदान कर रहा है । लेकिन ड्रामा के इस नऐ दृश्य को सराहने के लिए मेरे मन का सही ठिकाने पर होना आवश्यक है। आत्मसंवरण की ओर यह बहुत महान कदम होगा ।

अब समय है… विघ्नों को वरदान के रूप में देखने का, कुछ ऐसा जिससे सीखना है और आगे बढना है । अपने दृष्टिकोण को बदलना ही अपने भाग्य को बदलने की ओर पहला कदम है!

 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

 

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