प्रभु, मेरा पोषण करने के लिए शुक्रिया – Thank You Lord for Feeding Me (In Hindi)

प्रभु, मेरा पोषण करने के लिए शुक्रिया

Braun Bear say grace Brown Bear folding paws, pray before eating fish

हमें सिखाया गया है अपने भोजन को शुद्ध कर के खाना और हमें खिलाने वाले परमात्मा का धन्यवाद करना । उतना ही महत्व प्रार्थना करने का है, इससे भोजन के खराब प्रकम्पन्न विक्षेपित हो जाते हैं ।

हममे से बहुतों की अभी प्रकम् पन्नों के बारे में और विचारों की शक्ति के बारे में जागरूकता बढ़ गई है और हम हमारे शरीर और आत्मा पर इनके प्रभाव को भी मानने लगे हैं, अब हम क्राईस्ट और बुद्ध और दूसरे पैगम्बरों के विचारों को गहराई से समझने लगे हैं । जब हम सकारात्मक, उच्च कंपायमान विचारों को उत्पन्न करते हैं, जब हम कृतज्ञता का मनोभाव अपनाते हैं और शुक्रिया अदा करते हुए आदर से अपना भोजन स्वीकार करते हैं तो हम भोजन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं ।

स्वर्गीय प्रोफेसर इमोटो ने भी यह सिद्ध किया है कि जब हम पानी को प्रेम और धन्यवाद, ये केवल दो शक्तिशाली शब्द कहते हैं तो पानी में बहुत सुन्दर और परिपूर्ण क्रिस्टल बनते हैं ।

Thank You Lord for Feeding Me - Emoto Peace Project
Thank You Lord for Feeding Me

अगर हम अपने भोजन को प्रेम और आभार से शुद्ध नहीं करते हैं तो उसका प्रभाव पड़ता है । जब तब आप इसे सोचते हैं यह बात असम्भव लगती है लेकिन जो लोग हमारे भोजन को छूते हैं उनकी ऊर्जा भी हम ग्रहण करते हैं । किसी ने बीज बोया है और कोई दूसरा फसल काटता है । फिर इसे दुकानों में पहुँचाया गया फिर किसी और ने संचय किया: यह इस प्रक्रिया का सरलीकृत विवरण है । इस दौरान कोई ईर्ष्या में भोजन को छूता है क्योंकि वह कम्पनी का मालिक बनना चाहता है, कोई घृणा से क्योंकि वे अपनी नौकरी को तुच्छ समझते हैं, कुछ लोग लालच से छूते हैं क्योंकि उनको और अधिक चाहिए और शायद कुछ प्रेम से छूते हैं; वे अपने काम की क़दर करते हैं ।

Tractor with heap of paprika after harvest

कभी कभार ही ऐसा होता है कि हम एक घंटे पहले काटी गई ताज़ा फसल खाऐं, जैसा कि हम बहुत वर्षों पहले अपने घर के बाग से या स्थानिय खेतों से करते थे । भोजन जिसे प्रेम और आदर से और शुद्ध प्रेरणा से उगाया गया है । वह अन्न जिसे जिसे प्राकृतिक रूप से बिना हानिकारक खाद या कीटनाशक के उगाया गया है, और फ्रिज से या दूसरे ठंडक प्रदान करने वाले यंत्रों से ईएमएफ के बिना मिले हमारे खाने की मेज तक पहुँचाया जाता है । इसके अतिरिक्त ग्रह पर बेमतलब का प्रदूषण है जो कि वस्तुओं को पृथ्वी के एक भाग से लेकर दूसरे स्थान तक पहुँचाने में उत्पन्न होता है । और इन सबमें फिर वाणिज्यवाद की ऊर्जा का समावेश है । जो भी उत्पादन किया जाता है वह केवल पैसे के लिए । यहां तक की जो उत्पाद बिना कीटनाशक के पैदा किया गया है उसमें भी खरीदने, बेचने और लाभ कमाने की अस्वस्थ ऊर्जा है । जैसे कि इतना ही पर्याप्त नहीं है , जो लोग उस भोजन को छूते हैं, उठाते हैं, चाहते हैं लेकिन पाने में असमर्थ हैं उनकी ‘बुरी नज़र’ भी पड़ सकती है । कितना लालच और कितनी उदासी, ज़रा सोचिये!

तो क्या अब आप भोजन को ग्रहण करने से पूर्व उसको अच्छे प्रकम्पन्न देने के महत्व को समझते हैं? जो प्रकम्पन्न हम बाहर फैला रहे हैं उनके बारे में भी हमें सावधान रहना है । मन की सही अवस्था में भोजन पकाने से भी अच्छे प्रकम्पन्न हमारे भोजन में प्रवेश होते हैं । रसोइये के गर्म मिज़ाज से भोजन की ‘गर्मी’ (तेज़) और बढ़ जाऐगी और हमारे मूड पर भी असर पड़ेगा । अगर रसोई घर में प्रवेश करने से पहले हम अपने मनोभाव को शांत और मधुर बना लें तो हम भोजन में सही ऊर्जा के प्रवाह को सुनिश्वित कर देते हैं और जो उसको खाने वाले हैं उनको भी फ़ायदा होगा । निस्सन्देह, पौष्टिक ताज़ा भोजन ही सदा सर्वोत्तम है, अगर शाकाहारी है तो और ही अच्छा है । अगर हमारे विचार भी हितकारी और शांत हैं और वातावरण में मधुर संगीत बजाया जा रहा है तो इन प्रकम्पन्नों से हम अपने भोजन को स्वाद से भर देंगे जिसे लोग ग्रहण करते हुए अनुभव करेंगे!

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उपर की सब बातों के बाद जब अंत में हम मेज पर खाने बैठते हैं तो हमें उतना ही भोजन लेना चाहिए जितना हम खा सकते हैं और लालच में आकर अपनी आंखों को अपने पेट से बड़ा नहीं करना चाहिए । भोजन को व्यर्थ गंवाना बहुत बड़ा विकर्म है जो कि हम में से कई अनजाने में कर देते हैं । इसके पीछे ऐसा मनोभाव लगता है कि अगर हमने अपनी मेहनत से पैसा कमाया है और भोजन खरीदा है तो इसे व्यर्थ गंवाने का भी हमें अधिकार है । लेकिन ऐसा नहीं है । जो भोजन आपकी थाली में है वह भोजन कोई दूसरा ग्रहण नहीं कर पाएगा – कभी नही । आपने ग्रह से लिया है तो आपको किसी न किसी रूप में वापिस करना पड़ेगा ।

भोजन को, अन्नदाता को और धरती मां को धन्यवाद करने से, जो हमारा पोषण कर रहा है उसके प्रति हमारा मन आदर की भावना से भर जाता है । संतुष्टता केवल भूख मिटने से नहीं आती बल्कि समस्त विश्व के साथ शांति और समन्वय के सम्बन्ध से आती है ।

 “ जो कुछ भी आप मुझे उपलब्ध् कराते हैं उसके लिए शुक्रिया मेरे प्रभु           

आप मेरी आत्मा और शरीर को पवित्र बनाते हो और पोषण करते हो”

अब समय है… अपनी आत्मा और शरीर को कृतज्ञता के मनोभाव से पोषण करने का । शुद्ध प्रकम्प्ननों को उत्पन्न करना सीखें । जिस वस्तु की आपको आवश्यकता नहीं है उसे व्यर्थ नहीं गंवाऐं । (वेस्ट नॉट, वॉन्ट नॉट)

 

To read and hear the audio of the English version, please click here 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

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