पीड़ायुक्त से शांतिपूर्ण (From Painful to Peaceful – in Hindi)

पीड़ायुक्त से शांतिपूर्ण

Different expressions

शारीरिक कष्ट अच्छा अनुभव नहीं है । यह शरीर का तरीका है हमें यह बताने का कि कुछ ठीक नहीं है और बदलने की या ठीक करने की आवश्यकता है ।

भावनात्मक पीड़ा को सम्बोधित करना अधिक मुश्किल होता है । पूर्णतया स्वस्थ होने में टूटा हुआ हृदय, टूटी हुई टाँग से अधिक समय लेता है! इस प्रकार की पीड़ा हमें ‘ऊँचा उठा सकती है या नीचे गिरा सकती है’, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमने किस प्रकार उसका सामना किया है । हम दुख की गहराई में भी डूब सकते हैं या उससे उपर उठ सकते हैं ।

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कई बार पीड़ा व्यक्ति को बहुत कटु बना देती है । यह कटूता उनके शब्दों और व्यवहार में साफ झलकती है जब वे किसी बात पर अपनी शांती खो बैठते हैं ।

बहुत से ऐसे दर्द भरे तीर हैं जो हमारे हृदय को छलनी कर सकते हैं । लगभग सभी बातें हमें दर्द पहुँचा सकती हैं । किसी के बात करने के लहज़े से, कोई हमारी ओर किस अंदाज़ से देखता है, या नहीं देखता है, हमारे बारे में सोचता है या नहीं सोचता है । प्रत्येक दर्द भरे तीर से हृदय कमज़ोर होता जाता है । हमारा हृदय संकीर्ण हो जाता है, प्रेम का बहाव बंद हो जाता है और हम चिड़चिडे होने लगते हैं । हमारा लोगों से भरोसा उठने लगता है । धीरे धीरे हमारी ओर आते हुए सत्य प्रेम को भी हम नहीं पहचान पाते ।

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अगर कोई हमे दुख पहुँचाता है तो हमें लगता है उन्होंने हमें धोखा दिया है । फिर हम दूसरों से उनकी बातें करने लगते हैं, उनकी आलोचना करते हैं । हमें ऐसा लगता है जैसे कि हमें दुख पहुँचाने का बदला हम, दूसरों की नज़रो में उनकी छवि को खराब कर के लेते हैं । विश्वासघात हमें सनकी और घिनौना बना देता है । यह हमारे भीतर के सबसे घृणित स्वरूप को उजागर कर देता है ।

क्रोधमय जीवन बीताने से अच्छा है उस दर्द से सबक सीखा जाऐ । बिना कारण के हमारे पास कुछ नहीं आता है, और अक्सर अनुभव में कुछ फायदा छिपा रहता है । हम अपने भीतर झाँक कर धीमें से पूछें, ‘मैंने ऐसा क्यों किया?’ ‘क्या मैं इससे बेहतर तरीके से सामना कर सकता था?’ और शायद सबसे महत्वपूर्ण, ‘मैंने इस अनुभव से क्या सीखा है और अगर भविष्य में ऐसा दोबारा होता है तो इस अनुभव के आधार पर उसका सामना मैं कैसे करूँगा?’ अगर हम हर बार शिकार बनने के बजाय सबक सीखने के लिए समय निकालें तो परिस्थितियां हमें मज़बूत और दिलेर बना देंगी ।

हमें यह अहसास करना चाहिए कि अगर हमें लगता है कि हम पीड़ीत व्यक्ति हैं तो केवल हम ही ने स्वयं को ऐसा बनाया है । लोग हमारे बारे में बातें करेंगे, हमारा विरोध करेंगे, हमें नापसंद करेंगे, लेकिन मैं स्वयं के साथ अपना सम्बन्ध क्यूँ खराब करूँ? मैं अपनी शांती और खुशी को दूसरों के हवाले क्यूं करुँ?

यहाँ अहंकार दोषी है । हमारा अपना अहंकार ही हमें संवेदनशील और कमज़ोर बना देता है । या तो हम अपने बारे में बहुत बेहतर सोचते हैं या हमें लगता है कि हम लायक नहीं हैं । जब चलना दूभर हो जाता है तो ये दोनों ही चरमसीमाऐं दर्द उत्पन्न कर सकती हैं । जब हम अपनी आध्यात्मिक राह पर चलते हैं तो हम अपना स्वाभिमान फिर से पाने लगते हैं और दर्द का असर कम होने लगता है ।

जिन्होंने दर्द को एक सन्देशवाहक के रूप में देखने का रहस्य समझ लिया है वे मज़बूत, सकारात्मक और खुश रहते हैं । एक शक्तिशाली मन, साहसी हृदय ही दर्द से सीख सकता है और इसे भूला सकता है, लेकिन ऐसे ही हम शक्तिशाली बनते हैं । अगर हम अपनी मनोदशा बदल दें तो हो सकता है इसे हम सकारात्मक अनुभव के रूप में देखें! यह बहुत ऊँची मंज़िल अनुभव होती है लेकिन इससे जो शांति और शक्ति मिलती है वह यह पुरूषार्थ करने को प्रेरित करेगी ।

जब हम इस जीवन से विदाई लेंगे तो अंतिम स्मृति के रूप में हम क्या चाहते हैं, दर्द, बदला या चैन और शांति?

अब समय है… दर्द को शांति में बदलने का ।

 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

 

 

 

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