दूरदर्षिता और नैतिकता से भरपूर महापुरूष (A Man of Vision – In Hindi)

दूरदर्षिता और नैतिकता से भरपूर महापुरूष

इस सप्ताह 18 जनवरी को मैंने ब्रहमाकुमारी मेडिटेशन संस्था के संस्थापक ब्रहमा बाबा की पुण्य तिथी मनाई । उनकी आत्मा 1969 में चली गई परन्तु उनकी विरासत आज भी है । वे एक महान दूरदर्शी थे और वे कुलीन और अच्छे हृदय के व्यक्ति थे । उनके जीवन काल में और अब तक भी अपने सादे और ऊँच जीवन से उन्होंने लाखों लोगों को प्रेरणा दी है, और ए‍क बेहतर और कल्याणकारी व्यक्ति … विश्व कल्याणकारी बनने की आकांक्षा दी है । यहाँ उनके जीवन के कुछ उदाहरण हैं जिनसे हम भी प्रेरणा ले सकते हैं ।

30 वें दशक के बाद से लेकर 1969 तक, 300 भाई बहनों के समर्पित समूह के साथ पहले सिंध में फिर उत्तर पश्चिम भारत में माऊँट आबू में, ब्रहमा बाबा आश्रम में ही रहे हैं । हरके उनसे बहुत प्रेम करता था । वे उनके लिए आध्यात्मिक पिता, माता, शिक्षक, मित्र की तरह थे । हरेक के पास उनके साथ की बहुत सुंदर और हृदय को छूने वाली दास्तानें हैं ।

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उनकी नम्रता

उन दिनों में गोबर के उपले ईंधन के रूप में प्रयोग होते थे । ब्रहमा बाबा स्वयं दूसरों के साथ मिलकर आश्रम के सामने वाले स्थान पर उपले बनाते थे । जब ब्रहमा बाबा से कोई मिलने आते थे तो वे पूछा करते थे; “इस संस्था का प्रमुख कहाँ है?” और जवाब मिलता था: “ये हैं… ये हमें गाय के गोबर के उपले बनाने में मदद कर रहे हैं…” वह मनुष्य बहुत चकित रह जाता कि कोई इतना महान व्यक्ति इतना छोटा कार्य कैसे कर रहा है, जबकि कोई दूसरा गुरू एक गिलास पानी लेने के लिए भी अपनी गद्दी से नीचे नहीं उतरेगा ।

उन्होंने सबकी देखभाल की

संस्था के शुरूआती दिनों में मितव्ययता के कारण बड़ी सावधानी से भोजन की योजना बनानी पड़ती थी । कुछ ही मात्रा में दाल बनाई जाती थी, और गिन के ही चपाती बनती थी, ताकि कुछ भी व्यर्थ न जाऐ । एक दिन कुछ बुढ़ी माताऐं थोड़ी अधिक दाल लेने आ गईं लेकिन बर्तन में दाल नहीं बची थी । बाबा को मालूम हुआ तो उन्होंने अपनी दाल माताओं को दे दी । माताओं को और अधिक दाल इसलिए चाहिए थी क्योंकि उनके दाँत नहीं थे इसलिए वे सूखी चपातीओं को चबा नहीं सकती थीं और इसलिए भूखी थीं!

उनकी बुद्धिमत्ता और अर्न्तज्ञान

एक रात मुख्य बावर्ची बाबा के पास आई और बोली: ‘बाबा, आज रात एक असमंजस है, या तो आज बच्चों को दूध नहीं दे सकते… (जो उनके साथ रहते थे वे बच्चे कहलाते थे, क्योंकि वे बाबा थें – पिता) या सुबह दही नहीं दे सकते क्योंकि जो दूध आज रात को देने के लिए रखा था वह खराब हो गया है, और सुबह के लिए दही बनाने हेतू हमें अच्छा दूध चाहिए ।’ तो बाबा ने जल्दी से सोचा और कहा, ‘आज रात को बाबा स्वयं दूध बाँटेगा’ । जब हर बच्चा बाबा के पास आ रहा था और उनकी आँखों में देख कर उनका प्रेम अनुभव कर रहा था, उन्होंने यह नहीं देखा कि बाबा कितना दूध डाल रहे हैं । आम तौर पर मुख्य बावर्ची उनके गिलास उपर तक भर देती थी; आज गिलास केवल आधा ही भरा था । लेकिन बाबा की प्रेम भरी दृष्टि से हर कोई इतना संतुष्ट था कि उनको भरपूर और तृप्त लग रहा था । दूध का महत्व गौण था इसलिए उन्होंने ध्यान नहीं दिया । इस प्रकार उस रात हरेक के लिए दूध था और सुबह की दही के लिए भी बच गया था ।

उनका प्रेम

आश्रम में कोई बहन बीमार थी और उसको दो महीनें से रोज दस्त हो जाते थे । इतने समय से वह सोई भी नहीं थी । उन दिनों में पहाड़ों पर पेशेवर चिकित्सा सहायता मिलनी सरल नहीं थी । बाबा को पता चला कि वह बीमार है । वे उसके पास गए और बोले, “बच्ची, चिंता नहीं करो, सब ठीक हो जाऐगा । बाबा तुम्हें इन्जेक्शन देंगे और तुम ठीक हो जाओगी ।” बाबा ने इन्जेक्शन और कुछ दूध माँगा । उस बहन को पता नहीं था कि क्या है, बाबा ने उसे दूध का इन्जेक्शन दिया । उस रात वह बहुत अच्छी तरह सोई और ठीक होना आरम्भ हो गई । उसे महसूस हुआ कि बिना इस ‘प्रेम के इन्जेक्शन’ के उसकी मृत्यु हो गई होती ।

उनका रमणीक स्वभाव

एक बार अप्रैल फूल का दिन था । बाबा ने बच्चों के लिए विशेष मिठाईयाँ बनवाई । जैसे ही बाबा मिठाई बाँट रहे थे, तो उन सभी को अपने मुख में कुछ महसूस हुआ, कुछ अजीब सा । बाबा ने मिठाई के बीच के हिस्से में रूई भर दी थी । और बाबा ने उनको मीठा बेवकूफ बनाया था ।

दूसरी बार, बाबा ने साबुन को किसी रंग से रंग दिया था । और व‍ह साबुन बाबा ने विशेष रूप से एक बहन को दे दिया । जब उस बहन ने साबुन प्रयोग करना आरंभ किया तो साबुन का रंग उतर कर उसकी चमड़ी पर चढ़ने लगा । इस प्रकार बाबा अपने आसपास के छोटे से परिवार के साथ खेलते थे ।

 

उनकी उदारता

एक बहुत वरिष्ठ बहन और मेडिटेशन की प्रशिक्षिका बताती हैं कि: “सन् 1957 की बात है जब मैं प्रथम बार ब्रहमा बाबा से मिली थी । वे मेरे दादा की तरह थे । मैं केवल 8 वर्ष की थी । उनका व्यक्तिव बहुत करीश्माई था । उसके बाद हम लंदन में रहने चले गए । जब मैं 10 वर्ष की थी तो हमें हवाई डाक से पार्सल मिला । उसमें मुम्बई से आलफांसो आम आए थे । मेरा भाई और मैं बहुत आनन्दित हुए क्योंकि लंदन में उस समय आमों का नामोनिशान भी नहीं था । हमें अचरज हो रहा था कि यह बॉक्स किसने भेजा है… और ये ब्रहमा बाबा ने भेजा था । बाबा मुम्बई में आये थे और आम खा रहे थे, और उन्होंने हमें याद किया और डाकमेल से आम भेज दिये । मैं हक्की-बक्की रह गई । उस समय तक हमारे किसी भी रिश्तेदार ने हमें याद नहीं किया था, या हमें कुछ भेजने की तकलीफ उठाई थी!” ये था बाबा का प्रेम और उदारता ।

उनकी दूरदर्शिता

यही बहन अपनी कहानी आगे सुनाती हैं । “हम 1968 में बाबा से माऊँट आबू में फिर से मिले । उस समय उन्होंने मुझे कहा ‘बच्ची, तुम लंदन जाओगी और बहुतों की सेवा करोगी और इस ज्ञान को बाँटोगी । और वे तुमसे पुछेंगे: तुम्हें यह ज्ञान कहाँ से मिला? और तुम जवाब दोगी, माऊँट आबू से!’ और ऐसा ही हुआ । जब मैं लंदन गई और अनेक स्थानों पर भाषण दिया, बहुत से लोग मुझसे वही सवाल पूछते थे और मैं वही उत्तर देती थी । बाबा ने मेरी भविष्य की भूमिका को देख लिया था और उसे निभाने के लिए लगातार मुझे शक्तियों से भरते रहे ।”

उनकी सहृदयता

एक शिक्षिका ने कहा: “एक बार दिल्ली में शिक्षिकाओं की ट्रेंनिग चल रही थी, और मुझे उसका हिस्सा बनने के लिए भेजा गया । जब बाबा को मालूम हुआ कि जहाँ हम रहते हैं वहाँ से जिस हॉल में ट्रेनिंग होनी हैं वहाँ पहुँचने के लिए प्रतिदिन हमें एक व्यस्त सड़क को पार करके जाना पड़ेगा तो बाबा ने ट्रेनिंग वहाँ रद्द कर दी और हम सबको माऊँट आबू बुला लिया । ऐसा ध्यान था उनका हमारी सुरक्षा पर ।”

उनका प्रोत्साहन

एक मेडिटेशन शिक्षिका ब्रहमा बाबा के पास गई और बोली कि उसे इस जन्म में नारी क्यों बनाया गया । उस समय भारत में नारियों का बहुत निम्न स्थान था और उन्हें वे सुअवसर, ओहदे या आदर नहीं दिया जाता था जो पुरूषों को हासिल था । बाबा ने उसे बहुत प्रेम दिया और उसे उसकी विशेषताओं का स्मिरण करवाया और यह भी बताया कि संसार के उत्थान में औरतों की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है । उस बहन में एक नऐ स्वाभिमान का जन्म हुआ । बाबा जानते थे कि प्रेम, पोषण देने और करूणा जैसे स्त्रीयोचित गुणों की ही इस समय संसार को आवश्यकता है और नारियों को एक विशेष भूमिका निभानी है । आज भी ब्रहमा कुमारीज़ संस्था नारियों द्वारा संचालित होती है ।

उनका भरोसा

एक समय था जब बाबा ने एक भाई को एक शहर में ज़मीन खरीदने के लिए कहा । बाबा ने सोचा कि एक बहुत अच्छा ‘म्यूज़ियम’ (स्थाई प्रदर्शनी) बनना चाहिए ताकि बहुत से लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान मिल सके और उद्धार हो सके । बाबा उस भाई के हैरान चेहरे को देखकर एकदम समझ गए और कहा, “खर्चे की चिंता नहीं करना बच्चे, पैसा तो कहीं से भी आ जाऐगा । आप केवल ज़मीन देखो और किसी न किसी को मदद करने की प्रेरणा मिलेगी । बाबा तुम्हारे साथ है ।” उस भाई को अति उत्तम ज़मीन सहजता से मिल गई और जैसा बाबा ने सोचा था, धन आ गया और म्यूज़ियम बन गया । बाबा को पक्का विश्वास था कि कुछ भी संभव है । बस हमें दृढ़ संकल्प और अटल विश्वास करना होगा ।

ये कहानियाँ तो यूँही चलती रह सकती हैं । ब्रहमा बाबा ने संस्था को 1936 में आरम्भ किया था और यह आज, एक पहाड़ की चोटी के एक छोटे से कमरे से, जहाँ बाबा ने तपस्या की थी, से संसार के 130 देशों में हज़ारों सेवाकेन्द्रों के रूप में फैल चुकी है ।

जो उन्हें जानते हैं, और जो उनके बारे में जानते हैं, वे उन्हें कभी भूल नहीं सकते ।

अब समय है … ऐसे महापुरूष से सीखने का और उदाहरण बनकर अगुवाई करने का ।

 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

 

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