दिलचस्प (‘Interesting’ in Hindi)

दिलचस्प

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क्या आपने कभी यह विचार किया है कि वह क्या वस्तु है जो सारा दिन आपका ध्यान आकर्षित करती है? क्या भौतिक वस्तुऐं या मनुष्य? अगर हमें टीवी और इंटरनेट या क्रिकेट और फुटबॉल मनुष्यों से अधिक दिलचस्प लगते हैं तो हमने मानव जाति के रूप में अपना आचरण खो दिया है ।

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Audio – Interesting (Interesting piece of music by Armik – Tango-Flamenco)

राजयोग में ए‍क कहावत है कि जहां आपका मन होगा वहीं आपका तन और धन भी जाऐगा । जो कुछ भी हमें रोचक लगता है उसी तरफ हम खींचे चले जाऐंगे और उसी में हम अपना समय, ऊर्जा और संकल्पों का निवेश करेंगे । आप कहेंगे यह तो सामान्य सी बात है । फिर भी जब हम अपना मन (तन और धन!) इन बातों में लगाते हैं तो क्या हम अपनी ऊर्जा को बढ़ा रहे हैं या कम कर रहे हैं?

किसी भी सूरत में अब हम अपनी ‘रोचक’ प्रवृति का भरोसा कैसे कर सकते हैं? क्योंकि पिछले सप्ताह, पिछले महीने या पिछले साल जो हमें रोचक और उत्साहवर्धक लगता था वही कुछ ही पलों में हमें उबाऊ प्रतीत होता है । हम उन बातों में लिप्त होते रहते हैं और उनकी और आर्कषित होते रहते हैं, अंततोगत्वा हमारा सारा उमंग-उत्साह ढीला पड़ जाता है अर्थात पॉप में से फिज्ज़ निकल जाती है ।

जब हमें कुछ रोचक या दिलचस्प प्रतीत होता है तो हम व्याकुल हो जाते हैं, उसमें ध्यानमग्न हो जाते हैं और उसके अनुभव में डूबे जाते हैं । हम उसके प्रभाव में आ जाते हैं और उसमें अटक जाते हैं । तब हम स्वयं स्वयं के साथ नहीं रह सकते । जब कुछ भी ‘रोचक’ हमारी बुद्धि को अपनी ओर खींच लेता है तो मन स्वाधीन नहीं रह पाता, वह फंस जाता है । फिर हम बार बार इन स्वयं के बाहर के अनुभवों की ओर आकृषित होते रहते हैं । इसलिए आश्रम में साधारण और कम बुद्धि के उपयोग के कार्य करने के लिए कहा जाता है । मनोरंजन के लिए सदा बाहर देखने के मन के लयबद्ध नमूने को यह तोड़ देता है ।

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एक बार जब हम कह देते हैं कि कुछ चीज़ हमें दिलचस्प लगती है तो इसका अर्थ है कि दूसरी वस्तु जो हमें रोचक नहीं लगती उसके बारे में पूर्वाग्रह उत्पन्न कर दिया । फिर से आप कहेंगे कि यह तो सामान्य सी बात है । फिर भी अगर हम जीवन के उस पक्ष को यूँ ही खारिज करते रहे और जो बातें हमें रोचक नहीं लगती उनसे स्वयं को बचाते रहे तो जीवन के बहुत बड़े अनुपात को हम खो देते हैं । रोज़मर्रा के जीवन में हम दिन और रात की क़दर करना सीखते हैं । एक के बिना हम दूसरे की क़दर नहीं कर सकते । तो भी अगर हम उसमें दिलचस्पी पैदा कर लेते हैं जो कम दिलचस्प है तो हम जीवन का विरोध नहीं करते । बल्कि उसकी लय के साथ झूलते और झूमते हैं । हमारा जीवन और भी बहुमूल्य और अर्थपूर्ण बन जाता है ।

वास्तव में सच्चाई यह है कि, सबकुछ दिलचस्प लगना चाहिए और साथ साथ कुछ भी दिलचस्प नहीं लगना चाहिए । मुझे प्रत्येक वस्तु में सुंदरता और नयापन दिखाई दे, लेकिन उसमें मेरा मोह नहीं हो, दूसरे शब्दों में वह मुझे इतना दिलचस्प नहीं लगे कि स्थिरता और आंतरिक शांति के मेरे यर्थाथ लक्ष्य को मुझसे दूर ले जाऐ ।

अक्सर हम रूचि और नऐपन को स्वयं से बाहर ढूँढते हैं और इसलिए चीज़ें कभी नहीं बदलती – क्योंकि हमें स्वयं पर अंदर से पुरूषार्थ करना है ।

केवल आत्मा में ही रूचि से चिरस्थायी आनंद और आकर्षण की प्राप्ति हो सकती है । वास्तव में, स्वयं में और स्व के खोज की यात्रा का रूचि क्षेत्र सबसे फायदेमंद है । मैं कहां जा रहा हूँ? मैं मेरे साथ क्या कर रहा हूँ? मेरे साथ मेरा बर्ताव कैसा है? मेरा आशय यहां अहंकारी रूप से नहीं है बल्कि स्व-उन्नित के रूप से है ।

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जब एक बार हमारा ध्यान हमसे हट जाता है और औरों की ओर चला जाता है तो हम तुलना करना, इल्ज़ाम लगाना, नापसंद करना आरम्भ कर देते हैं या एक या दूसरी बात में मशगूल हो जाते हैं, और फिर हम अपने आप को, अपनी खुशी, शांति और आनंद को खो देते हैं । जब हम अपनी यात्रा में ही दिलचस्पी रखते हैं और स्वंय की उन्नति करते हैं तो हम स्वयं के ही परम मित्र बन जाते हैं । केवल तब ही हम दूसरों के साथ भी मधुर सम्बन्ध बना सकते हैं ।

आध्यात्मिक जीवन और अधिक दिलचस्प है क्योंकि हम ग़ैरमामूली में मामूली से उपर देख सकते हैं । हम दूसरे आयामों की भी जांच कर सकते हैं और रहस्यों को देख और महसूस कर सकते हैं कि कोई बात ऐसे क्यों हैं जैसे वह है! हर पल में जादू है । एक भी पल नीरस नहीं! इस श्रेष्ठता के स्तर से हम हर पल का, हरेक सम्बन्ध का और हर नई चीज़ जो हमारे पास आती है उसका आनंद ले सकते हैं । लेकिन हम विकर्षणों को, हमें आवेश में लाकर बहा ले जाने की और हमारी ऊर्जा को छीनने की अनुमति नहीं देते ।

अब समय है… स्वयं पर ध्यान देने का और अपनी ही यात्रा में रूची लेने का । भौतिक वस्तुऐं केवल हमारे मनोयोग और ऊर्जा का उपभोग करती हैं लेकिन आन्तरिक पुरूषार्थ करने से अनगिनत पुरस्कार प्राप्त होंगे । अब क्या यह अधिक दिलचस्प नहीं है?

Meditation Commentary – Interesting (Music by Armik – Tango Flamenco)

 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

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