अपना जीवन दांव पे मत लगाओ! – Don’t Take a Gamble (in Hindi)

अपना जीवन दांव पे मत लगाओ!

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कोई भी व्यसन जो आपको बिना यथार्थ और निरंतर प्रयास के शीघ्रता से धनवान बनने की चाहना उत्पन्न् कराता हो वह संदेहास्पद है । जुआ खेलने की आदत न केवल जोखिम भरी है, यह भ्रांति पैदा करने वाली भी है । यह देखा गया है कि यह न केवल खेलने वाले का जीवन बर्बाद कर सकता है बल्कि उसके आस पास रहने वालों का भी ।

तो चाहे आप ऑनलाईन जुआ खेलते हैं, कैसिनों में, खेलों पर, सक्रैच कार्ड या लॉटरी टिकेट खरीदते हैं, स्टॉक और शेयर में सौदा करते हैं, या स्लॉट मशीन पर बार बार जाते हैं तो आप इस आदत के दोषी हैं । पहले बेशक यह परम सुख से परिपूर्ण महसूस होता हो, लेकिन इसके बाद शीघ्र ही जुआरी अपनी जेबों की तरह स्वयं को खाली महसूस करता है ।

जुआ खेलने से झूठी आशा पैदा हो जाती है । ये हमें इस झूठी कल्पना में, विश्वास में जीने के लिए मजबूर कर देता है कि एक दिन मुझे ढेर सारा पैसा मिलेगा, और मेरा जीवन अचानक ही अप्रत्याशित लाभ से गुलाबी आनंदित हो जाऐगा । हाँ, मुझे लगता है कि यदा-कदा हर किसी को महत्वकांक्षी होकर सोचने की इज़ाजत है लेकिन उसके बाद ! यह खिलाड़ी को उस ख़ास जीत के लिए थकेहाल इन्तज़ार करवाता है जो कि वह मानता है कि एक दिन होगी… लेकिन यह भी सम्भव है कि वह कभी हो ही ना !

जुऐ का सम्बन्ध आलस से भी है । यह खिलाड़ी को शीघ्रता से बड़ी सफलता, तात्कालिक परिणामों के के वादों से लुभाता है । धैर्यता क्यों रखनी और इन्तजार क्यों करना या कड़ी मेहनत क्यों करनी जब मेरी सभी समस्याओं का हल कल आसानी से मिल सकता है? अपने जीवन को संयोग और भाग्य पर छोड़ना सरासर मूर्खतापूर्ण है । जब किसी ने अच्छे कर्मों के बीज ही नहीं बोए तो वह फल प्राप्ति की आशा कैसे रख सकता है ! अगर आप वास्तव में विश्वास करते हैं कि लॉटरी की टिकेट खरीदना ‘बीज’ बोना है तो आप अपने भाग्य को निर्धारित कर रहें हैं । यह दर्शाता है कि आपको अपने आंतरिक पुरूषार्थ पर भरोसा नहीं है, बल्कि आप अपनी खुशी की बागडोर अपने सभी दांव लगाकर ए‍क ऐसे उद्योग को दे रहें हैं जिसे अपनी खुशी के अलावा किसी और बात से कोई सरोकार नहीं है ।

द्यूतक्रीड़ा का सम्बन्ध अहंकार और सशक्त बनने के झूठे अहसास से है; पैसे से ही प्रेम है लेकिन सम्पन्न्ता और समृद्धि को प्राप्त करने के साधन या पुरूषार्थ से नहीं है । किसी दूसरे को मात देने से और उन्हें हारने के लिए मजबूर कर देने से एक जीत का अहसास होता है । एक रॉलर कॉस्टर झूले की तरह जब तक हम जीत रहे है तो हम स्वयं को बहुत बुलंदियों पर महसूस करते हैं लेकिन जब हम हारना आरम्भ करते हैं तो हम बहुत शीघ्र् नीचे आ जाते हैं- मुँह के बल नीचे गिरते हैं- हमारा अहंकार चकनाचूर हो जाता है !

इस बात को महान भारतीय महाकाव्य महाभारत में अत्यंत कुशलता से चित्रित किया गया है । शुरूआत में, संदिग्ध कौरव कुल ने भारतीय शतरंज के खेल में, निर्दोष और सच्चे पांडवों को धोखे, मक्कारी और कपटपूर्ण तरीकों से मात दे दी । लेकिन बाद में इस बुरे कर्म का फल मिला जब पांडव पाँच भाईयों ने सहजता से सौ कौरव भाईयों को हरा दिया और महाभारत के प्रसिद्ध युद्ध में विजय हासिल की ।

हम सब जानते हैं कि जुआ खेलने का व्यसन व्यक्गित और सामाजिक तौर पर ‍एक बढ़ती हुई समस्या है । हमें लगता है कि यह हम पर लागू नहीं होता लेकिन क्या हमें अहसास है कि जीवन में हम प्रतिदिन कितने जुऐ खेलते हैं ?

हर बार जब हम अच्छाई के स्थान पर बुराई को, चुनौतिपूर्ण के स्थान पर शिथिल मार्ग को, सच्चाई के स्थान पर बेईमानी को चुनते हैं तो हम जुआ खेल रहे हैं । हम ‘माया’ के साथ जुआ खेल रहे हैं जिसे भ्रम कहा जाता है । यह माया वो खिलाड़ी है जो जीतने के लिए रक्त की प्यासी है ! माया आपको धोखा देने के लिए, भ्रष्टाचारी बनाने के लिए, ठगने के लिए, मात देने के लिए कुछ भी करेगी । माया हमें जीत का अहसास करवाती है; मगर अंत में हम हार जाते हैं, और माया हमारा स्वाभिमान हमसे छीन लेती है ।

जब तक हम कछुए की भांति, प्रतिदिन संयुक्त सकारात्मक पुरूषार्थ करते हैं तो हम निश्चित रूप से स्पर्धा जीतते हैं । इसका कारण है कि ऐसा करने से हम अपनी नियति को किसी असम्भव संभावना के हाथों में छोड़ने के बजाय अपने कर्मों में विश्वास को सुदृढ़ कर रहे हैं । जब हम अपनी जिम्मेवारी उठाते हैं और संयोग या सम्भावना में नहीं जीते तो हम अपने भाग्य के मास्टर रचयिता बन जाते हैं ।

अब समय है… अपने जीवन को संयोग के हाथों में न छोड़कर उसकी बागडोर अपने हाथ में लेने का!

 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

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