चलिए सकारात्मक रिवायत का निर्माण करें – Let’s Create a Positive Narrative (in Hindi)

हमें केवल भय से ही भय रखना है – फैन्कलिन डी रूज़वैल्ट

 

 

 

प्रतिदिन सरकार और लॉकडाउन आदि के बारे में साधारण मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से नकारात्मक रिवायत (ब्यान) हमारे मन मस्तष्कि में भरी जा रही है, तो इस बात में कोई आश्चर्य नहीं हैं कि इस भय के माहौल में लोग बहुत अधिक तनाव का अनुभव कर रहे हैं । वायरस का विषय अभी सबसे ऊपर चल रहा है और ऐसा लगता है कि कोई दूसरी ख़बर बची ही नहीं है । यही उपयुक्त समय है जब हम एक सकारात्मक रिवायत की शुरूआत करें उसकी पालना करें और उससे ही जुड़ें रहें । हमें इस भय के रिवायत से दूर रहना होगा जिसमें हमने खुद को फंसा लिया है ।
हाँ, मुझे विश्वास है कि बाहर वायरस है, और कुछ लोगों के लिए दुर्भाग्यवश यह बहुत घातक सिद्ध हो सकता है । लेकिन जो कुछ भी हम जानते हैं और वायरस के स्वभाव के आधार से हम कह सकते हैं कि, अगर हम वायरस से प्रभावित हो भी जाते हैं तो अगर आमतौर पर हमारा स्वास्थ्य बेहतर है तो हम मरेंगे नहीं । जो कमज़ोर हैं, बुज़ुर्ग हैं और पहले से ही जिनकी सेहत खराब है वे वायरस के वशीभूत हो जाते हैं वह उनके श्वाँस प्रणाली पर हमला करता है । निस्संदेह कुछ अपवाद भी होते हैं, और अभी तक हमारे पास तथ्य और आँकड़े नहीं हैं ।
लेकिन कुछ बातें निश्चित रूप से हमारे स्वस्थ होने की सम्भावना को और हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देंगीं । ये हमें बहुत उपयोगी सिद्ध होंगी अगर हम इन पर ध्यान दें और इनके अनुसार कदम उठाऐं:
• अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाऐं
• जो कुछ भी हम खा रहें हैं उसके प्रति और सचेत हो जाऐं (70% – 80% रोग प्रतिरोधक क्षमता हमारी आँतों में है)
• साँसों के अच्छे व्यायाम करके अपने फेफड़ों की क्षमता को बढ़ाऐं
• अपने स्वच्छता का स्तर बहुत ऊँचा रखें
• अपने विचारों की सम्भाल करें और सदा सकारात्मक विचारा ही उत्पन्न करें
• जो भी अच्छी चीज़ें हमारे जीवन में हैं उनके लिए धन्यवाद का भाव रखें
• जीवन प्रेम, शांती, दया और करूणा से व्यतीत करें
• जब भी मौका मिले अच्छे कर्म करें

भय को स्वीकार नहीं करें

मैं कहती हूँ कि कुछ ऐसे मनोभाव होते हैं जो हमें “कहीं भी नहीं” नामक स्थान पर ले जाते हैं (जो कि एक अच्छा स्थान नहीं है) । अगर हम अपने मन को ब्रेक लगाना आरम्भ नहीं करते तो मुझे ऐसा लगता है कि इस पल हम सभी उसी दिशा में अग्रसर हैं । ये भय से भरे हुए विचार हमें धीरे धीरे वहाँ ले जाते हैं (“कहीं भी नहीं”!), जिस समय तक हमें इस बात का अहसास होने लगता है उस समय तक बहुत सा बहुमूल्य समय और ऊर्जा व्यर्थ जा चुकी होती है!

खुशी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है

भय और चिंता और क्रोध इस तरह के मनोभाव हमारे जीवन पर बहुत महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभाव डालते हैं । हमें इनका त्याग कर देना चाहिए । ये हमारे समय को बर्बाद कर देते हैं और हमारी ऊर्जा को शून्य कर देते हैं । उस गीत को याद करें “डोंट वरी बी हैप्पी!” क्या हमने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि खुशी, चिंता करने से श्रेष्ठ क्यों है? क्योंकि खुश रहना हमारी प्राकृतिक अवस्था है । चिंता करना नहीं! क्योंकि खुशी हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है । खुशी, हमें जीने के लिए, सहन करने के लिए, संघर्ष करने के लिए जोश से भर देती है और खुशी हमें विजय दिलाती है!
जब हमें कोई अपनी धौंस दिखाता है तो बस खुश रहें । हाँ, उन्हें लगेगा कि हम पागल हैं, लेकिन वे यह भी अनुभव करेंगे कि जब हमने उनको शक्ति देना बंद कर दिया तो उनकी हम पर कोई ताकत नहीं रहती! डरने से, रोने से, या परेशान होने से और रूठने से, दूसरे शब्दों में वे लोग जो हमें बनाना चाहते वह बनने से, अर्थात परेशान होने से हम शक्तिहीन बन जाते हैं । अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का सुरक्षित तरीका है जब हम जो कुछ भी महसूस कर रहे हैं तो उसे नकारें नहीं, लेकिन उस दुख को स्वीकार कर के भी हम सशक्त अनुभव कर सकते हैं – उसे करने का एक तरीका है ।
जब भी हम भय में होते हैं तो, हम तनाव के हॉरमोन उत्पन्न करते हैं और ये हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम कर देते हैं । और हम वास्तव में स्वयं को बीमार करना आरम्भ कर देते हैं । इन सबके लिए आज बहुत से सबूत मौजूद हैं । विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करता है । जब हम भय में होते हैं तो हमें कुछ भी स्पष्ट नहीं होता, हम उलझन में आ जाते हैं और सही स्पष्ट निर्णय नहीं ले पाते, और इसलिए हम गल्तियाँ करते हैं । फिर उन समस्याओं को ठीक करने के लिए हमें और अधिक समय और ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है ।

 

अपने परिणाम का चयन करने की शक्ति हमारे हाथ में हैं
अपने विचारों के आहार को बदल दें
तो हमें और अधिक विश्चास में रहना है, और अधिक खुशी में, और जो कुछ भी हमारे आसपास हो रहा है उसके प्रति और अधिक शांति में रहना है । जो कुछ भी हो रहा है उसका कुछ कारण है । कहानी स्वत: ही स्वयं को प्रत्यक्ष कर देगी ।
चलिए अपने विचारों की खुराक को बदल लेते हैं । हमें रिवायत को बदलने की आवश्यकता है । अपने परिणाम का चयन करने की शक्ति हमारे हाथ में हैं । भेड़ों के झुंड की तरह न चलें । बहुत से लोगों ने अपनी सेहत अपने हाथ में ले ली है और चिकित्सा के अनेक विकल्पों के बारे में सुशिक्षित हो गये हैं । अपने शरीरों को प्राकृतिक चिकित्सा, होम्योपैथी या आर्युवैद से परिपूरक करना इत्यादि । अगर हम थोड़ा रूक कर देखें तो अपने शरीरों को सुन सकते हैं, यह हमें बताऐगा कि हम बहुत अधिक खा रहे हैं । या बहुत अधिक तला हुआ या मीठा । अगला कदम होगा उस संदेश का ख्याल रखने की इच्छा शक्ति और पर्याप्त स्वमान ।
निश्चित रूप से घर में टीवी नहीं होना चाहिए क्योंकि यह हमारे मन रूपी कमरे में वायरस के आने का साधन बन जाता है, हमारी सोच को प्रभावित करता है, और जो भी इसके सामने बैठता है उसे यह भय से भर देता है । निस्संदेह अभी तो कम्पयूटर तक भी हमारी बहुत पहुँच है । जो कुछ भी हम देखना चाहते हैं उसे परख कर देखना चाहिए । सभी तकनीकी बहुत अच्छी है, लेकिन उसे संयम से प्रयोग करना चाहिए और रिमोट को अपने हाथ में रखना चाहिए ना कि उन्हें दे देना चाहिए । साथ ही, मेरा आखिरी बिन्दू, जो कुछ भी हम देखते व सुनते हैं उस सब पर विश्वास नहीं करना चाहिए । क्योंकि वह टीवी पर है या मीडीया में हैं इससे वह बात सत्य नहीं हो जाती । अपना स्वयं का शोध करें । अपनी आँखें और कान खुले रखें, और अपने आसपास घटित हो रहे ड्रामा के प्रवाह को देखें । आपको मार्गदर्शन मिलेगा । अपनी अटकलों पर विश्वास करें ।

समय बदलता है लेकिन सत्यता नहीं
सत्यता सदा ही रास्ता खोज लेगी
स्वयं को प्रत्यक्ष करने के लिए सत्यता सदैव ही कोई रास्ता खोज लेती है । जिस प्रकार चाहे आप कितनी भी दीवारें खड़ी कर दें या पर्दे लगा दें लेकिन प्रकाश को छुपाया नहीं जा सकता, हमेशा ही सूक्ष्म दरारों से प्रकाश की जगमगाहट दिखाई देगी । सत्यता हृदयों को छू लेती है । सत्यता प्रत्यक्ष होती है और सत्यता प्राकृतिक और शाश्वत होती है । जब फूल वास्तिवक होते हैं, हम स्वीकार कर लेते हैं कि एक दिन वे मुरझा जाऐंगे । स्थिर क्या है? सामान्य क्या है? समय बदलता है लेकिन सच्चाई नहीं ।
सबसे महत्वपूर्ण बात है कि मेडिटेशन करें और अपने अर्न्तमन में शांति अनुभव करें । स्वयं का और परिस्थितयों का सामना करने के लिए यही रास्ता उपयुक्त है । मेरा विश्वास है कि अगर समस्त विश्व मेडिटेशन करे और दिल से प्रार्थना करे, तो इस ग्रह के प्रकम्पन्न कुछ अलग ही होंगे । हम अपनी चेतना को ऊँचा उठा कर और अपने प्रकम्पन्नों के स्तर को उठा कर अपने ग्रह के प्रकम्पन्नों को भी ऊँचा उठा सकते हैं ।

अच्छे कर्म करें
जब तक हम इस “अनैच्छिक” रिट्रिट से बाहर आऐंगे हमारे बहुत से कर्म अनुकूलित हो चुके होंगे । कहा जाता है कि किसी भी दिशा में अनुकूलित होने के लिए 21 दिन लगते हैं । कुछ लोगों के लिए पुराने व्यवहार की ओर जाना मुश्किल हो जाऐगा, जहाँ सदा स्वयं को संघर्ष और चुनौतियों से गुज़रना पड़ता था । दूसरे कुछ के लिए, हो सकता है उन्होंने अपने लिए जीवन के गहरे उद्देश्य ढूँढ लिये हों । कुछ लोग इस दौरान बहुत अविष्कारशील और रचनात्मक बन गए और हम देखेंगे कि इन सबसे बहुत सी नई रचनाओं और अविष्कारों की बौछार होगी । जन्म हमेशा खोमोशी से होता है । कोई भी ‘इसे’ नहीं देख पाता जबतक कि यह बाहर ना आऐ । लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि पुराना, नऐ के लिए रास्ता देना आरम्भ कर देगा । वाक़ई, हम क्रांतिकारी बदलाव को देख रहे हैं ।

रिवायत को बदलें
अब हम पर है कि हम प्रेम बाँटे और दयालुता से जियें । दूसरों के प्रति दयालु रहें । जब यह सब समाप्त हो जाऐ तो दूसरों के करीब जाने से डरे नहीं, अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता और अपने शुभ कर्मों पर आपकी रक्षा करने के लिए विश्वास रखें । शुभ कर्मों के बीज बोना जारी रखें । और जब हम ऐसा करेंगे तो हम अपने चयन की वास्तिवकता का निर्माण करना आरम्भ कर देंगे । हम अपने जीवन में आज जो भी सामग्री डाल रहे हैं उसके लिए सचेत रहना होगा, क्योंकि हम अपने कल का निर्माण कर रहे हैं । अब सवाल है: जो कुछ भी हम बो रहे हैं उससे हम खुश होंगे?

अब समय है … एक ऐसी रिवायत उत्पन्न करने का जो प्रेम, शांति, दया और खुशी पर आधारित हो । चलिए आज नही अभी शुरू करते हैं ।

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