क्या हो अगर? – What If (in Hindi)

क्या हो अगर?

हम कितनी बातों की चिंता करते हैं, जबकि अक्सर हमारी चिंता न्यायसंगत नहीं होती । क्या आपने ध्यान दिया है कि बच्चे इतनी चिंता करते नहीं दिखते? हमने अपनी मासूमियत, वो बेफिक्री कब खोई? अगर हम सम्भाल न करें तो अधिक चिंता करना भी एक बीमारी हो सकती है । अच्छा योजना बनाने बाला बनना, खतरों का उपाय करना और बहुत सर्तकता बरतना एक बात है लेकिन जीवन के प्रत्येक छोटे छोटे विवरण के बारे में चिंता करना एकदम दूसरी बात है ।

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सबसे बड़ा कारण जिसके बारे में हम सब चिंता करते हैं वह है असुरक्षा: हमें चिंता रहती है कहीं हम अपनी नौकरी से हाथ न धो बैठें; हमारे बच्चे हमारे नियत्रंण से बाहर ना हो जाऐं; कहीं हमारा वज़न ना बढ़ जाऐ; कहीं हमारे साथ दुघर्टना ना हो जाऐ, यह सूची बेहिसाब है! हमारी कितनी चिंताऐं वास्तव में आती हैं? बहुत कम!

जो बात हमें चिंतित कर रही है उसके बारे में आप कुछ कर सकते हैं तो करिए! अगर नहीं तो चिंता करने से कोई फायदा है क्या?

असल में चिंता करना हमारी शक्तिशाली विचार शक्ति को व्यर्थ करना है, और साथ में और भी मूल्यवान स्रोतों का जैसे हमारा समय और शारीरिक ऊर्जा का भी ह्रास होता है । जब हमारा मन सक्रिय रूप से चिंता करने में व्यस्त है तो हमारा पूरे शरीर पर भी दबाव पड़ने लगता है । हमारा श्वसन तीव्र गति से होने लगता है । हृदय खून की और अधिक मात्रा स्पंदित करने लगता है । मांसपेशियाँ खिंचने लगती हैं । फाईट और फलाईट के लक्षण आने लगते हैं; चिंता का एक ही विचार काफी है!

जैसे ही मन अनगिनत संख्या के ‘क्या होगा अगर… ,’ के दृश्यों में फँस जाता है तो बहुत सी बुराईयों के आने का द्वार खुल जाता है । जिन बातों की दिन भर हम चिंता करते हैं उनका कोई अंत नहीं है ।

चलिए वायुयान में सफर करने का उदाहरण लेते हैं । जब आप वायुयान में चढ़ने वाले होते ही हो तो आप लाखों उन बातों के बारे में सोच सकते हैं जो गलत हो सकती हैं । कास्टावे फिल्म आपके मन में आती होगी । कुछ मिनटों के लिए आपके मन में आतंकवादी हमले की बात आ सकती है, या पायलेट को दिल का दौरा पड़ने से उसकी मौत होना, और फिर… नहीं! क्या होगा अगर सह-पायलेट को कुछ हो जाता है!… हो सकता है इंजिनियर ने इंजिन सही तरीके से चैक नहीं किया और दोनों में से एक इंजिन खराब है और नाकाम हो जाऐगा…! जैसा कि मैने कहा कि अगर अपने मन को हम अनुमति दें तो चिंता करने के बहुत से कारण हैं!

जब हम चिंता कर रहे हैं तो हमने वर्तमान को खो दिया! हमने बहुत अच्छे लोगों से मिलने का मौका खो दिया और शायद पेय भी आकर चले गए, परिचारिका की मुस्कान, नीचे का सुंदर दृश्य और रूई जैसे बादलों का आकृषण करने वाला दृश्य!

अंग्रज़ी में डर (फियर) ‘फॉल्स इविडैन्स अपियरिंग रियल – झूठे गवाह जो कि वास्तविक प्रतीत हो रहे हैं’ का आदिवर्णिक शब्द है । हमारे बहुत से डर निरर्थक होते हैं और शायद लाखों में एक (या शायद करोड़ों में, यह हमारी कल्पना पर निर्भर करता है!) साकार होता है । यह वास्तविक नहीं है!

अगर हम चिंता करते हैं, तो अक्सर इसलिए क्योंकि अंदर में हम सुरक्षित नहीं हैं और इसका यह अर्थ है कि यह आवश्यक नहीं है कि बाहर की परिस्थितियाँ असुरक्षित या संकटपूर्ण हैं! सभी चिंताऐं मन में और हमारी कल्पना के दूरूपयोग से आरम्भ होती हैं । अक्सर आदत के कारण भी! अहंकार को यह मानना अच्छा लगता है कि उसने सब मालूम है । इसलिए असफलता की संभावनाओं से बचने के प्रयास में, स्वयं को सुरक्षित करने के प्रयास में इसे चिंता होने लगती है ।

चलिए एक वास्तविक चिंता का विषय लेते हैं, जैसे कि आपके बच्चों को ड्रग्स की लत लग जाना । चिंता करने के बदले, अतिरिक्त विचार उत्पन्न करने और डरने के स्थान पर, स्वयं से एक सवाल पूछें कि इस बारे में क्या कर सकता हूँ? फिर आवश्यक कदम उठाऐं । अपने बच्चों की सुरक्षा करें । उन्हें शिक्षित करें । निवारण में अपना बेहतरीन प्रयास करें ।

आप पाऐंगे कि, जैसे ही आप अपने मन को भयावह दृश्यों के बदले, सम्भव समाधानों से व्यस्त कर देंगे तो आपको चिंता कम होगी । निस्संदेह आप और अधिक समाधान ढूँढ पाऐंगे, या जितना हो सके उतना आपने स्वयं को तैयार किया है तो हो सकता है आप समस्या को ही टाल दें । उदाहरण के लिए, ड्राईविंग टेस्ट या कुकिंग के लिए प्रदर्शन तैयार करना! जो आलसी और लापरवाह हैं उन्हें चिंता अधिक होती है और अब आप समझ सकते हैं क्यों!

इसी प्रकार, अगर मेडिटेशन के माध्यम से हम अपने मन को संभालना सीख जाते हैं तो चिंता कम करते हैं । जब हम चिंता करते हैं तो हम बाहरी हालातों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं । हम अपने अंतर को नियंत्रित नहीं कर रहे हैं । जब हम आत्मसयंम पुन: हासिल कर लेते हैं तो हम पाऐंगे कि हमें ‘बाहर’ का कुछ भी सम्भालने की आवश्यकता नहीं है । जो कुछ भी होता है उसे हम स्वीकार कर लेते हैं और खुश और निश्चिंत रहते हैं ।

अब समय है … एक ऐसा दिन निकालने का जो चिंतामुक्त हो । जान लें कि हर समस्या का समाधान है । कोई ऐसा ताला नहीं होता जिसकी चाबी ना हो!

 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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