क्या आप प्रोजैक्टर हैं? (Are You a Projector in Hindi)

क्या आप प्रोजैक्टर हैं?

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प्रक्षेपक (प्रोजैक्टर) एक ऐसी मशीन है जो किसी भी छोटी वस्तु को व्यापक रूप से बड़ा कर देती है । प्रक्षेपक की तरह हम भी किसी दूसरे इंसान के व्यक्तिव की विशिष्टता, जो कि बहुत छोटी और मामूली होगी, हम उसे अनुपात से कहीं अधिक बढ़ा देते हैं । हम दोष देकर, घृणा या नाराज़गी से प्रतिक्रिया करते हैं ।

Audio in English – Are You a Projector? (Music by Cafe Del Maar – Vol Trece II)

 

प्रक्षेपण या ‘दोषारोपण करना’, दूसरों पर अपना मलबा पटकने की मनुष्य की आदत है । हमारे अंदर ही आदत है जो हमें दुख देती है और हम उसका दोष दूसरे पर लगा देते हैं । उदाहरण के लिए अगर मैं अपने मित्र पर साथ ना देने का या मेरे साथ समय ना बिताने का दोषारोपण करता हूँ और मैं अपने ही दर्द में लड़खड़ाता हूँ तो इसका अर्थ है कि मैंने स्वयं को ही अपना मित्र नहीं बनाया है और मैं दूसरों से वह अपेक्षा करता हूँ जो वह नहीं दे सकते । मित्र के पास उपलब्ध नहीं होने के अपने कारण हो सकते हैं, लेकिन जो इंसान प्रक्षेपण कर रहा है उसे निश्चित तौर पर लगता है कि उनके मित्र ने उन्हें छोड़ दिया! प्रक्षेपण की अवधारणा फ्रॉयड ने दी थी उसने विचार किया कि, ‘…स्वयं के जो विचार, प्रेरणाऐं, इच्छाऐं और भावनाऐं स्वीकार नहीं होती उन्हें हम बाहर के संसार में और दूसरों पर आरोपित करके संबोधित करते हैं’ । (वीकीपीडिया)

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अगर आप विचार करें तो हम किसी बात पर जब तक प्रतिक्रिया नहीं करेंगे जब तक हम उस बात से तादात्म्य

स्थापित नहीं करते । मैं नकारात्मक तरीके से किसी ज़रूरतमंद को क्यूँ प्रतिक्रिया करूँगा? क्यूँकि मैं खुद भी ज़रूरतमंद हूँ । मुझे लोगों में असभ्यता क्यों पसंद नहीं आती? फिर से,क्योंकि मैं भी कभी बहुत असभ्य बन जाता हूँ! गरीब लोगों के आसपास मुझे असुविधाजनक क्यों लगता है? केवल इसलिए कि मुझे स्वयं के लिए दरिद्रता का भय है ।

एक दूसरा उदाहरण है शादी का, एक साथी दूसरे साथी पर विश्वासघात करने का इल्ज़ाम लगाना तब आरम्भ करता है जब उसमें खुद में बेफ़ाई या धोखा देने के संकल्प आते हैं । ताकतवर अपनी संवेदनशीलता का प्रक्षेपण कमज़ोर पर करता है और जब उसे पीटता है तो उसे फिर से ताकत प्राप्ति का अहसास होता है । एक सकारात्मक ढ़ंग से, एक मां, जो अपने जीवन में कुछ बन नही पाई वह अपना वही लक्ष्य पूर्ण करने की आशाओं का प्रक्षेपण अपनी बेटी पर करती है या एक अध्यापक, जो वह स्वयं नहीं हासिल कर पाया, उस उत्कृष्टता का प्रक्षेपण अपने विद्यार्थियों पर करता है ।

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कितनी बार हम दूसरों की ओर अंगुली करते है और उसी समय तीन अंगुलियाँ वापिस हमारे ही तरफ संकेत कर रही होती हैं । जैसा हम महसूस करते है जब उसका दोष हम दूसरों पर लगाते हैं तो हम ज़िम्मेवारी से छुटकारा पाना चाहते हैं । इल्ज़ाम लगाना ज़िम्मेवारी उठाने के विपरीत है और दूसरों पर दोष लगाना स्वयं में कम शक्ति होने का संकेत है ।

जब मैं दूसरों पर दोष लगाता हूँ तो मैं अपनी शक्ति उनके हवाले कर रहा हूँ । अगर आप कहते हैं, ‘आप मुझे दुखी कर देते हो’, तो अवचेतन रूप से मैं यह भी कह रहा हूँ कि, ‘केवल आप ही मुझे खुशी दे सकते हो!’ और अवश्य ही ऐसी बात नहीं है!

जब मैं दोष लगाता या आलोचना करता हूँ तो ऐसे विचार मुझे शक्तिहीन बना देते हैं । मैं शिकार बन जाता हूँ । मेरा जीवन मेरे नियंत्रण में नहीं रहता । और अगर मैं अपने जीवन का प्रभारी नहीं हूँ तो और कौन है?

पहली बात तो मुझे प्रक्षेपण करने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? उत्तर हमारे भीतर हमारी असुरक्षा में समाहित है । जब हम में स्वयं के महत्व की महसूसता नहीं है तो हम स्वयं को सुंदर या योग्य या धनवान दिखाने का प्रयास करते हैं या स्वयं के बारे में हमारी नकारात्मक भावनाऐं दूसरों पर थोपते हैं ताकि वे खराब दिखें । हम प्रक्षेपण तभी करते है जब हम जो कुछ भी हमारे भीतर चल रहा है उसको हम सम्भाल नहीं पाते हैं । लेकिल मेडिटेशन से और थोड़े स्वाभिमान को बढ़ा कर हम स्वयं का मुकाबला करने की अवस्था में पहुँच जाते हैं और वही कार्य करते हैं जो करने की आवश्यकता है ।

एक बार जब मैं अपने महत्व और मूल्य को जान लेता हूँ, एक बार जब मैं अपने विचारों, भावनाओं और खुशी की ज़िम्मेवारी उठा लेता हूँ तो मुझे बाहर कुछ प्रक्षेपण करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी ।

मुझे स्वयं को एक बार फिर याद दिलाने की आवश्यकता है: मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ या नहीं कर रहा हूँ इसका ज़िम्मेवार मैं स्वयं हूँ । कोई दूसरा नहीं, केवल मैं ही बदलाव ला सकता हूँ । मैं अपने जीवन का रचयिता, निर्माता हूँ ।

अब समय है… प्रक्षेपण करना बंद करने का और एक बार फिर से अपने विचारों, भावनाओं और खुशीयों की ज़िम्मेवारी उठाने का । दोषारोपण करना बंद कर दें, ज़िम्मेवारी लेना आरम्भ कर दें और फिर आपको कभी भी ‘प्रक्षेपक’ की आवश्यकता नहीं पड़ेगी!

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© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

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