एक कविता वायरस के नाम – ODE to the Bug (in Hindi )

एक कविता वायरस के नाम

भीतर रहना है
भीतर रहना है उन्होंने यही बताया
लेकिन कौन से भीतर
मुझे नहीं मालूम
क्या गली में जो मेरा घर है उसके भीतर
या फिर इस घर के भीतर जो आत्मा का घर है?

दूरी रखनी है
दूरी रखनी है उन्होंने यही बताया
लेकिन कौन सी दूरी
मूझे नहीं मालूम
क्या मेरे मित्रतापूर्ण पड़ोसी से दूरी रखनी है
या ये मेरे आंतरिक भय और परेशानी से

घबराओं नहीं
घबराओ नहीं… उन्होंने कहा
लेकिन हुआ क्या है… हर कोई घबराया हुआ है…
तो उन्होंने क्या किया
उन्होंने इक्‍ट्ठा कर लिया
लेकिन उन्होंने क्या इक्ट्ठा कर लिया
क्या घर में खाने का सामान जमा करना था
या फिर आत्मा में शक्तियाँ जमा करनी थी

उन्होंने बहुत कुछ कहा
लेकिन
लेकिन उनके कहने और उनके अर्थ में अंतर था

 

वे भूल गये कि प्रकृति मुख्य आलेख का निर्देशन कर रही थी
वही तो बात कर रही थी
प्रकृति तो कोई और ही कहानी ब्यां कर रही थी
और जिन्होंने सुना, बस उन्होंने ही ‘सुना’
उसकी धुंधली सी तान को
अगर हम सबको सुनना था
तो हमें जागना था
हमें मन को शांत करना था
केवल शहर को शांत नहीं करना था
शांति हमें मदद करती
ड्रामा के अगले खंड को सुलझाने में

लेकिन कुछ जागना नहीं चाहते थे
उन्होंने स्वप्न को वरीयता दी
जीवन से भी अधिक

और जो जाग गऐ थे
वे अंधेरे में भी स्पष्ट देख पाऐ
रात्रि और प्रकाश के मध्य में
वे भयभीत नहीं थे और अपने पराक्रम में स्थिर थे
वे तत्पर, मुस्तैद, सुसज्जित और उत्तेजित थे
पर्दे के खुलने के लिए और अगले दृश्य को दिखाने के लिए

क्योंकि वे ही तो नायक होंगे जिनका दूसरे अनुसरण करेंगे
और नऐ विश्व में, वे ही अगुआई करेंगे
अपने उत्साह और गुणों और साहस और प्रकाश से

उन्होंने एक नया संसार बनाया
वह प्रेम, शांति और खुशी से भरपूर था
समन्वयता का जहाँ राज था और करूणा विकसित थी
और मानवता का एक बार फिर से नवीनीकरण हो गया

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