आप साधारण हैं या विशेष हैं? (Are You Ordinary or Special – in Hindi)

आप साधारण हैं या विशेष हैं?

Beautiful young woman jumping on  a green meadow with a colored tissue

हाल ही में लन्दन में हम दादी जानकी के साथ इस विषय पर चर्चा कर रहे थे । वे हमें प्रेरित कर रहीं थीं कि हम साधारण न रहें! यह बहुत सी वार्तालापों का विषय बन गया… इसका क्या अर्थ है कि हम विशेष बनें ना कि साधारण? यहाँ कुछ रत्न हैं जो उभर कर आए!

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जब मैं साधारण हूँ तो मैं बुराईयों में लिप्त होती हूँ और उनका आनंद लेती हूँ! मैं उनके साथ और अधिक अंतरंग होने लगती हूँ और वे मेरा आरामदायक क्षेत्र बन जाती हैं, वही क्षेत्र जिसमें हम से बहुत से लोग बहुत समय से रह रहे हैं! बुराईयों से उपर उठना अर्थात विशेष बनना और श्रेष्ठ बनना । क्रोध विकार, शक्ति की आवश्यकता का प्रतीक है । जब मैं शक्तिशाली बन जाती हूँ तो मैं क्रोध को समाप्त कर सकती हूँ । काम विकार अर्थात प्रेम की ज़रूरत, जब मैं स्वयं को प्रेम करती हूँ तो मुझे काम विकार के सहारे की आवश्यकता नहीं रहती । मोह अर्थात दूसरों पर निर्भरता है, जब मैं स्वयं बहुत सशक्त और स्वतंत्र बन जाती हूँ तो मुझे मोह की आवश्यकता नहीं रह जाती । अहंकार मेरे बारे में एक झूठा प्रतिबिंब उत्पन्न कर देता है, जब मुझे अपने सत्य स्वरूप का बोध हो जाता है तो मैं अहंकार को समाप्त कर सकती हूँ । लालच असन्तोष है । जब मैं अपने आंतरिक खज़ाने देख कर संतुष्ट हो जाती हूँ तो लालच को जाने देती हूँ ।

जब मैं साधारण हूँ तो मैं दूसरों की तरह ही व्यवहार करती हूँ । उदाहरण के लिए, अगर किसी ने मेरा अपमान किया है तो बदले में मैं भी उनका अपमान करूँगी । अगर किसी ने मेरी कोई वस्तु ले ली है तो बदले में मैं भी उनका कुछ ले लूँगी । इससे कर्मों की गति बदलती नहीं है । कुछ अलग और विशेष करने के लिए मुझे कुछ अधिक मेहनत करनी पड़ेगी, केवल तभी मुझे विशेषता का प्रमाण पत्र प्राप्त होगा!

funny yogi relaxing, meditating and practicing yogic breathing

ग्रीक भाषा में साधारण को ‘सीनीथीया’ कहते हैं जिसका अर्थ है आदतानुसार या आभ्यासिक । जब कोई बात बिलकुल आदत जैसी बन जाती है तो वह साधारण बन जाती है । आरम्भ में हर बात नई लगती है लेकिन अगर वह बार बार दोहराई जाए तो वह बहुत चिढ़ पैदा करने वाली, ऊबाउ और नित्य कर्म बन जाती है! इसलिए इस साधारणता को समाप्त करने के लिए, जो कुछ भी हम करते हैं उसमें हल्के से जितनी भी हम ला सकें उतनी नवीनता लाने की आवश्यकता है ।

इसलिए जब हम एक ही बात बार बार करते हैं तो प्रगति का अनुभव नहीं होता । जीवन ऐसे भी हो सकता है जैसे सीढ़ी चढ़ना । प्रतिदिन, प्रति सप्ताह अपने उद्देश्य और मंज़िल की ओर एक कदम आगे बढ़ने का अहसास होना चाहिए । नहीं तो हर बात फिर से बहुत साधारण और नीरस लगेगी! फिर भी इस अहसास के लिए कौन ज़िम्मेवार है? केवल मैं!

चलिए इसका सामना करते हैं; कोई भी साधारण नहीं बनना चाहता । अगर आप किसी को कह दें कि वे बहुत साधारण हैं तो हो सकता है उनकी सम्पर्क सूची से आपका नाम ही काट दिया जाऐ! उदाहरण के लिए, अगर हम अपनी कार धोते हैं तो उसे हमें ध्यान से तवज्जो देकर करना है (काम समझकर नहीं) । जब हम अपने बच्चों को स्कूल लेकर जाते हैं तो इसे हमें खुशी से करना चाहिऐ । जब हम फल और सब्ज़ियाँ खरीदते हैं तो उसे हम स्वयं के लिए प्रेम और आदर से करें । यही कारण है कि जब बहुत से लोग योगियों को फर्श साफ करते हुए देखते हैं तो उनकी दृष्टि उनकी बाल्टियों और पोछे पर नहीं पड़ती बल्कि उनके चेहरे की संतुष्टता और शांति पर पड़ती है ।

Two Indian tibetan old monks lama in red color clothing sitting in front of mountains

जूते चमकाने वाले लड़के की कहानी है, जिसका मनोभाव उसकी नौकरी से कहीं ऊँच था; सकारात्मक, शक्तिशाली और खुशनुमा । लोग रोज़ाना उसके पास केवल अपने जूते साफ करवाने ही नहीं आते थे बल्कि उसके मनोभाव की एक झलक पाने भी!

श्रेष्ठ बनने का अर्थ है कुछ अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है लेकिन यही बेहतर है । ऐसा करने के बहुत लाभ हैं । सबसे पहली बात है कि हमें अंदर से बहुत अच्छा महसूस होता है । दूसरा हम अपने चारों ओर सकारात्मक वायुमंडल बना रहे हैं, हम अपने लिए अच्छे कर्म कर रहे हैं और पुराने अवांछित कर्मों को चुक्तु कर रहे हैं । हमारा जीवन उद्देश्यपूर्ण और सार्थक प्रतीत होता है क्योंकि अंधेरे से भरे संसार में हम रोशनी फैला रहे हैं ।

Steine im Wasser 3

श्रेष्ठ बनने का अर्थ हैं स्वयं को वस्तुत: समझना । यह समझना कि मैं इस संसार की नहीं हूँ, मेरी चेतना बहुत बेहद मे है, वह भौतिक चेतना नही है । जब मैं स्वयं के बारे में एक अविनाशी सत्ता के रूप में अपनी जागरूकता को ऊँचा उठाती हूँ, सभी सकारात्मक विशेषताओं से भरपूर आत्मा, तो स्वत: ही श्रेष्ठ अनुभ होगा । यही असाधारण है!

अब समय है… य‍ह अहसास करने का कि आप कितने विशेष हैं!

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

 

 

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