आत्मिक सुषुप्ति – Soul Sleep (in Hindi)

आत्मिक सुषुप्ति

हम में से बहुत शारीरिक रूप से तो जगे हुए होते है, फिर भी दूसरे रूपों से सो रहे होते हैं । आमतौर पर सोना हमारे लिए अच्छा होता है और इसके बिना बहुत समय तक हम जीवीत नहीं रह सकते । लेकिन जब चेतना सो जाती है तो ‘झपकी ली तो नुकसान हो जाएगा (इफ यू सनूज़ यू लूज़)’ इस कहावत का दूसरा दृष्टिकोण प्रत्यक्ष हो जाएगा!

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जिस प्रकार नींद हमारे शरीर को फिर से ऊर्जा से भरने के लिए आवश्यक है, उसी प्रकार ‘जागरूकता’ आत्मा को ऊँचा उठाने के लिए अति आवश्यक है । हम अपने विचारों और अपने आसपास की चीज़ों के प्रति जितना अधिक सचेत, चौकस और जागरूक रहेंगे, और अपनी नई समझ के अनुसार प्रतिपल अक्सर ऊँचा चयन करेंगे फिर हम दिन प्रति दिन प्रबुद्ध बनते जाऐंगे ।

आत्मा के जागने का अर्थ है अनेक बातें हैं: लेकिन एक साधारण तल पर इसका अर्थ है असावधान और लापरवाह होने के विपरीत अपने विचारों के प्रति सावधान रहना और सही समय पर सही सोचना, सही कहना और सही करना । जागरूक रहने का अर्थ है कि हमेशा स्वयं को अभागा समझने, पीछे छूटा हुआ समझने के बजाए अगले र्स्वणिम सुअवसर को पहचानकर उसका फायदा उठाना है! जागरूक होने का अर्थ है विस्मरणशील बनने के स्थान पर ज़रूरत के समय बाँटना और देना । इसका अर्थ है आलसी और लापरवाह बनने के बजाय हर पल कर्म करने के लिए मुस्तैद और सावधान रहना । इसका अभिप्राय है दूसरों की आवश्यकताओं के बारे में तटस्थ रहने के बजाय संवेदनशील बनना ।

जब हम हमारे बिस्तर पर गहरी नींद में सोये होते हैं हम स्वयं में ही खोये होते हैं; हमारे सपनों और इच्छाओं की दुनिया में । हमें लगता है कि हम आराम कर रहे हैं, लेकिन अक्सर अवचेतन मन हद से अधिक कार्य कर रहा होता है । तो जितना आराम हमें चाहिए उतना हमें कभी नहीं मिलता, क्योंकि आंतरिक रूप से हम शांत नहीं है ।

अभी कल्पना करें, कोई मनुष्य जो कि कोमा की बेहोशी में है । उसके सामने चाहे आप कितना भी तेज ढोल बजाऐं वह जागेगा नहीं । वह उपस्थित या जागरूक नहीं है । इसी तरह से आत्मिक सुषुप्ति है, हम अपने स्वार्थी, आत्मकेंद्रित के एकाकी संसार में खोए हैं । हम बेहद की मानव जाति के बारे में न सोचकर केवल स्वयं के बारे में ही सोचते हैं और अपने व्यक्तिगत आजीविका का ही ध्यान रखते हैं । हम ग्रह पर अपने कर्मों के प्रभाव के बारे में नहीं सोचते । हम केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए जीते हैं, और हम बस अपने ही संसार में खुश हैं । हम बेहद की तस्वीर के बारे में बहरे और अंधे हैं, सूक्ष्म प्रक्रिया या कड़ी जो इस भौतिक संसार के पीछे है उससे हम अनभिज्ञ हैं । हम उन अदृश्य ऊर्जाओं को नहीं समझ पाते जो हमारे अस्तित्व को तराशती हैं ।

इस बात का बोध कि हम केवल 3डी शरीर हैं हमें अचेतन करने के लिए प्रर्याप्त है । हम शायद उठने के लिए या अपनी गहरी सच्चाई जानने के लिए तैयार नहीं हैं । इससे डर लगता है या अपनी सच्चाई के प्रति जागरूक होने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी । हमें लगता होगा कि ‘अज्ञानता आनंद है’! और यह भी सत्य है कि हम सब अपने अपने समय पर जागेंगे जब हमारे लिए सही समय होगा ।

हम में से बहुत से लोग कभी जागे होते हैं कभी सोये होते हैं । यह इस बात पर निर्भर करते है कि अपनी चेतना को जागृत रखने के लिए हम कितने चौकन्ने हैं । लेकिन जब आत्मा सुषुप्त अवस्था में है तो कितना कुछ हम खो रहे हैं? असल में बहुत कुछ ।

जब हम आत्मिक अवस्था की जागरूकता की ऊँचाई पर होते हैं, हम अधिक खुश, अधिक उज्जवल, अधिक आनंदित होते हैं! हम अधिक प्रेमपूर्ण, करूणामयी, आश्वासित और आत्मविश्वासी होते हैं । हम आदतों और भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि एक गहरी समझ से कार्य करते हैं । हम अपने व्यक्तित्व के नकारात्मक पहलूओं को आसानी से छोड़ देते हैं और सकारात्मकता को गले लगाते हैं और निर्माण भी करते हैं ।

हम स्वयं के प्रति और दूसरों के प्रति अधिक उदार बन जाते हैं । हम बहुत भिन्न और अधिक संतुष्ट करने वाला जीवन जीते हैं, क्योंकि केवल समय बीताने के विपरीत असल में यही जीना लगता है । जीवन अब संघर्ष नहीं लगता, बल्कि खोज का रोमांचक सफर बन जाता है ।

किसी थका देने वाले दिन के अंत में, अपने बिस्तर पर सोने जाना बहुत तसल्ली देने वाला, आरामदायी, और पुरस्कार जैसा लगता है ।

लेकिन फिर भी सबसे बेहतर आनंद तो नए दिन के अनुभवों के लिए, सूरज चमकने और पंछियों की चहचहाट के साथ उठकर चौकन्ने और रोमांचक, आनंदित और प्रेरित होकर जागरूक होने में है ।

अब समय है… अज्ञानता की निंद्रा से जागकर प्रेम, खुशी और नई खोजों की दुनिया में प्रवेश करने का!

 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

 

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