अविश्‍वसनीय भारत (Incredible India – The Brighter Side in Hindi)

अविश्‍वसनीय भारत

 

भारतीय संस्‍कृति संसार की सबसे प्राचीन सभ्‍यताओं में से एक है । भूतकाल में पश्चिमी संस्‍कृतियों ने इसके कुछ रीति रिवाजों का मजाक उडाया था और उनके सुखद और लाभदायक पहलूओं की कदर करने में असफल हुए थे । जब ब्रिटेन ने भारत पर कब्‍जा किया था तो उसने भारत के कुछ रीति रिवाजों को बदलने का प्रयास किया था । आज हम देखते हैं कि इनमें से कुछ रीति रिवाज हमारे हित के लिए और जीने के लिए कितने लाभदायक हैं, ये केवल परम्‍पराऐं नहीं हैं जिनका अनुसरण हमें बिना सोचे करना है । हमारे आज के समय में भारत हमें कुछ लाभदायक पद्धतियॉं और जीवन जीने का तरीका प्रदान कर सकता है ।

नमस्‍ते – अभिवादन
आज सोशल डिसटेंसिग के समय में नमस्‍ते करना बिल्‍कुल सही है और राष्‍ट्रपतियों और राजाई घराने के लोगों को भी इसकी आदत पड गई है । अगर हम आत्‍मा की स्‍मृति से आत्‍मा को नमस्‍ते कहते हैं, यह समझ कर कि यह अभिवादन प्रत्‍येक प्राणी को आदर और सत्‍कार देने के लिए है, तो सोशल डिसटैंसिग की समस्‍या समाप्‍त हो जाती है ।
नमस्‍ते एक संस्‍कृत का शब्‍द है जो कि दो शब्‍दों से मिलकर बना है , ‘नमस’ और ‘ते’ । नमस का अर्थ है ‘झुकना’ और ते का अर्थ है ‘आपको’ । इसलिए, नमस्‍ते का अर्थ है: “मैं आपके समक्ष झुकता हूँ” “मैं आपकी महानता के आगे झुकता हूँ ।” या, “मैं आपके आदर में आपके आगे झुकता हूँ ।”
दोस्‍तों का, सम्‍बन्‍धियों का और अन्‍जान लोगों का एक जैसा अभिवादन और स्‍वागत करने के लिए, दोनों हाथ प्रार्थना की मुद्रा में हृदय के सामने आते हैं । ये मुद्रा शिष्‍टता, अतिथि सत्‍कार, धन्‍यवाद और शालीनता व्‍यक्‍त करती है । जब दोनों हाथ साथ साथ जुडते हैं तो ऊँगलियाँ और अंगुठा एक दूसरे पर जोर डालते हैं, जिससे कि और अधिक एक्‍यूप्रैशर मिलता है और शरीर के ऊर्जा का प्रवाह आसानी से होता है । नमह शब्‍द का अनुवाद यह भी हो सकता है कि ‘ना मैं’ या यह ‘मेरे बारे में नहीं है’ दूसरे शब्‍दों में मैं इन्‍चार्ज नहीं हूँ और मैं ऊँच सत्‍ता के समक्ष समर्पित होता हूँ ।

शाकाहरी
मैं एक शाकाहारी घर में बडी हुई हूँ और जन्‍म से ही शाकाहारी हूँ । बहुत से लोग जो हिन्‍दू पृष्‍ठभूमि से आते हैं उनके लिए यह बहुत सामान्‍य बात है । शाकाहार का अर्थ है किसी भी प्रकार के मांस खाने से परहेज करना । ये तो कुछ समय से ही ऐसा हुआ है कि मैं कहूँगी कि भारत के लोगों को मीट खाना फैशनेबल लगता है । जब भारत में मुगलों और ब्रिटिश ने घुसपैठ की तो समस्‍त भारत में कई स्‍तरों पर उनका प्रभाव फैल गया । पाकशैली में कई प्रकार का बदलाव आया क्‍योंकि बहुत से जानवरों के व्‍यंजनों का समाविष्‍ट हो गया । नहीं तो अगर आप महाभारत और रामायण की पवित्र कहानियों में देखेंगे कि लोग उस समय शाकाहार भोजन ही ग्रहण करते थे ।
दो कारणों के कारण भोजन शाकाहार था ।
1) जानवरों को त्रद्धेय माना जाता था और पूजा की जाती थी और उनको विश्‍व का और मनवता का पावन हिस्‍सा माना जाता था ।
2) सेहत के लिए और तंदरूस्‍ती के लिए – क्‍योंकि मृतक जानवर का मांस सडकर बीमारी पैदा करता है ।

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उपवास
उपवास करना बहुत से धर्मों में महत्‍वपूर्ण है और भारत में भगवान को राजी करने के लिए भेंट चढाने और अनुष्‍ठान करने की सूची में उपवास का भी बहुत ऊँचा स्‍थान है । उपवास करने के बहुत से कारण हैं: लोग धार्मिेक त्‍योहारों पर धन्‍यवाद के भाव से उपवास करते हैं; देवताओं को प्रसन्‍न करने के लिए ताकि देवताऐं बदले में व्‍यक्तिगत इच्‍छाओं की पूर्ति करें । लेकिन उससे भी महत्‍वपूर्ण है उपवास शरीर को अच्‍छी सेहत और संतुलन प्रदान करता है और बहुत से वैज्ञानिकों ने इसे सिद्ध किया है ।
असल में, सप्‍ताह का प्रत्‍येक दिन विशेष समझा जाता है और अगर कोई चाहे तो उपवास का दिन माना जा सकता है । क्‍योंकि सूर्योदय से लेकर सूर्यास्‍त तक उपवास किया जाता है, और जो ईष्‍ट देव हैं उनको याद किया जाता है और पूजा की जाती है । उन देवताओं का प्रसन्‍न करने के लिए विशेष रंग के वस्‍त्र पहने जाते हैं, या देवताओं को उस रंग के पुष्‍प, भोजन या वस्‍त्र अर्पित किये जाते हैं ।

हाथों से खाना
बहुत से पश्चिमी लोगों को सांस्‍कृतिक सदमा लगता है जब वे भारतीय लोगों को चमकते हुए छुरी कॉंटे के बजाए हाथों से खाते हुए देखते हैं । चाहे आप माने या ना माने, लेकिन आपकी ऊँगलियों का फलोरा और आपके ऊँगलियों के पोरों पर जो नसें होती हैं वे आपकी पाचन क्रिया को और आपके खून के प्रवाह को सही करते हैं, और ये फैन्‍सी छुरी कॉंटे से कहीं बेहतर है । वेदों और धार्मिक ग्रन्‍थों के हिसाब से, आपके हाथ एक ऐसा अंग है जो बार बार कर्म में आता है । ऐसा माना जाता है प्रत्‍येक ऊँगली पॉंचों तत्‍वों का ही प्रसार है – अंगुठा आकाश का प्रतीक है, पहली अंगुली हवा की, बीच की अंगुली अग्नि, अनामिका जल की और छोटी अंगुली धरती की प्रतीक है । असल में, जब हम हाथों से खाते हैं तो भोजन की गर्माहट का अहसास हो जाता है और हम अपना मुँह नहीं जलाते । साथ ही भोजन का आनंद भी लेते हैं, इससे भोजन स्‍वादिष्‍ट लगता है और इसके लिए अधिक सराहना होती है ।
और जब हम अपने सीधे हाथ से भोजन ग्रहण करते हैं, तो उल्‍टे हाथ को साफ रखने का रिवाज है, अगर कोई दोबारा लेना चाहता है या किसी दूसरे को भोजन परोसना चाहता है तो हाथ साफ हो । बहुतों को इसके बारे में मालूम नहीं है, तो अगर आप भारतीयों के साथ भोजन ग्रहण कर रहे हैं तो ध्‍यान रखें!

नीचे फर्श पर बैठ कर खाना
दूसरी बात जो अंग्रेजों को बहुत परेशान करती थी जब वे भारत पर राज करते थे वह थी फर्श पर बैठकर खाने की पुरानी परंपरा । जब हम धरती पर बैठ कर खाते हैं तो वह सुखासन होता है, या पालथी मारकर बैठते हैं । तो यह जैसे खाना, बैठना और आसन करना साथ साथ हो रहा होता है । इस अवस्‍था में बैठने से हमारे दिमाग को पाचक जूसों को बनाना आरम्‍भ करने का संदेश जाता है क्‍योंकि भोजन पेट तक प‍हुँचने ही वाला होता है । जब हम खाने के लिए झूकते हैं और फिर पीछे हट कर चबाते हैं, तो ये इस योगिक क्रिया से पाचन बहुत अच्‍छा होता है क्‍योंकि इससे उदर की मांसपेशियों को दबाव मिलता है जिससे पाचन बेहतर होता है । और इससे हमारे शरीर की अवस्‍था भी सुधर जाती है ।

सप्‍ताह का हर दिन विशेष है
सप्‍ताह के प्रत्‍येक दिन की अपनी विशेषता है तो इस प्रकार भारत में हर दिन एक त्‍यौहार है ।
रविवार का दिन सूरज देवता का होता है, या सूर्य नारायाण देवता या सूर्य देव ।
सोमवार का दिन भगवान शिव का होता है । इसे सोमवार इसलिए कहा जाता है क्‍योंकि यह नाम सोम या चंद्र या चांद से लिया गया है, इसलिए यह दिन हिन्‍दू देव चंद्रमा का है । शिव का ही दूसरा नाम सोमनाथ है ।
मंगलवार का दिन देवता गणेश, हनुमान, दुर्गा या काली का है । इसे मंगलवार कहते हैं और इसका सम्‍बन्‍ध मंगल ग्रह से है ।
बुधवार का दिन कृष्‍ण देवता को और बुध ग्रह को समर्पित है । बुद्धि अर्थात समझ, अत: अगर कोई उपवास करे तो य‍ह दिन व्‍यापार या विद्या में बुद्धिमान और दक्ष बनने का है ।
ब्रहस्‍पतिवार, देवताओं के गुरू के रूप में मनाया जाता है । इस दिन विष्‍णु (चारभुजाधारी देवता) की पूजा की जाती है । इस दिन को पवित्र माना जाता है और दूध और घी से पूजा की जाती है और उपवास को भी इसी प्रकार का मालदार भोजन खाकर तोडा जाता है ।
शुक्रवार अर्थात शुक्रिया मनाने का दिन । इस दिन को संतुष्‍टता की देवी – मां संतोषी को समर्पित किया जाता है और उनकी की पूजा की जाती है । इस दिन शुक्र देवता का शगुन होता है ।
शनिवार अर्थात शनि का दिन । शनि का शगुन नकारात्‍मक होता है और इसलिए शनि देवता के क्रोध से बचने के लिए इस दिन विशेष उपवास किया जाता है । बहुत से हिन्‍दू शनि को इतना भयानक मानते हैं कि वे इस दिन यात्रा करना भी टाल देते हैं ।

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त्‍यौहार – सदा खुशी का माहौल
भारत में बहुत प्रकार की संस्‍कृतियाँ होने के कारण आए दिन ही कोई त्‍यौहार होता है । और त्‍यौहार लोगों को आपसे में जोडता है, साथ में खाना, मिलना, नाचना, खुशियॉं मनाना, सत्‍संग करना अर्थात दिव्‍य वार्तालाप करना, और और भी बहुत कुछ होता है । जब लोग इन त्‍यौहारों के लिए तैयार होते हैं तो इससे उनका उत्‍साह बढता है । इतने चमकीले रंग उन लोगों के मूढ को भी अच्‍छा कर देते हैं जो जानबूझकर नहीं मनाना चाहते, और हर त्‍यौहार के साथ खुशी का अंत: क्षेपण हो जाता है ।
भारत में सबसे बडा त्‍यौहार दिवाली है उसके बाद नव वर्ष मनाया जाता है । क्रिसमस, ईद भी हैं साथ ही मकर संक्राति, होली, दशहरा, नवरात्री, बुद्ध पूर्णिमा बौद्ध धर्म से, महावीर जयंति जैन धर्म से और इस प्रकार असीमीत सूची है । प्रत्‍येक त्‍यौहार को कैलेंडर में खगोल विद्या से संरेखित किया गया है ताकि वह हमें पूरे वर्ष मार्गदर्शन करता रहे ।

कुंभ मेला
कुंभ मेला संसार का सबसे बडा धार्मिक समागम है और इसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है । बहुत से हिन्‍दूओं के अनुसार यह समय है गंगा में जाने का, और उसके पवित्र जल में स्‍नान करके अपने पापों को धोने का । उस समय सबसे मुख्‍य भक्‍त नागा साधू होते हैं । कुंभ मेला चार शहरों में बारी बारी होता है : हरिद्वार, प्रयाग, नाशिक और उज्‍जैन । 10 फरवरी 2013 को प्रयाग में करीब 30 मिलियन लोगों ने कुंभ मेले में भाग लिया था ।

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भारत के ब्रहमचारी संत
ऐसा माना जाता है कि अगर भारत के ब्रहमचारी संत अगर नहीं होते तो भारत और तीव्र गति से गिरावट की ओर चला जाता । भारते के साधु पवित्र जीवन व्‍यतीत करते हैं इस कारण से उनको विशेष आदर की दृष्टि से देखा जाता है । कुछ साधु तो आध्‍यात्‍मिकता की उँचाईयों को पाने के लिए सबकुछ त्‍याग कर देते हैं । अक्‍सर हर शहर में और हर कोने में वे बैठे दिख जाते हैं और खाली बैठे ही मिलते हैं लेकिन हमें यह याद दिलवा देते हैं कि जीवन कितना नश्‍वर है । असल में जो राख उनके शरीर पर होती है वह हमें याद दिलाती है कि यह शरीर एक दिन राख होने वाला है ।

गायों के लिए सम्‍मान और पूजन
गायों की पूजा इसलिए होती है क्‍योंकि ये हमें कई मायनों में पालना देती हैं, उनको माता के रूप में देखा जाता है । कृष्‍ण जी को गायों को हॉंकते हुए और गोपीयों के लिए बांसुरी बजाते दिखाया गया है । कृष्‍ण के बहुत से नामों में से एक नाम है गोपाल अर्थात जो गऊओं की रक्षा करे । गाय हमें दूध देती हैं और यह अपने आप में ही उदारता है क्‍योंकि दूध से दही और घी आदि बनता है । गाय के गोबर को खाना बनाने के ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है, इसलिए गाय भारतीय संस्‍कृति का अभिन्‍न अंग है ।

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मंदिर और पवित्र स्‍थान
अधिकर मंदिर, गिरिजाघर और पवित्र स्‍थान चुम्‍बकीय ऊर्जा की रेखाओं के साथ होते हैं जिससे इन स्‍थानों के आसपास की सकारात्‍मक ऊर्जा को बढाने में मदद मिलती है । इसलिए मंदिर में जाने से सकारात्‍मक मन बन जाता है और भौतिक प्रभाव कम हो जाता है । अक्‍सर देवता की मूर्ति के तले एक तॉंबे की प्‍लेट रखी जाती है । यह तॉंबा ऊर्जा को अवशोषित कर लेता है और फिर उसे चारों ओर फैला देता है ।

आरती और कपूर का जलाना
आरती एक ऐसी प्‍लेट होती है जिसमें कुछ कपास की बाती होती हैं और कुछ कपूर और लाल कुमकुम का पावडर होता है । हिन्‍दू भक्ति में कपूर को सदियों से प्रयोग किया जाता है । इस आरती को फिर घडी की सुई की दिशा में घुमाया जाता है और आरती का गीत साथ साथ बजाया जा रहा होता है । गीत के समाप्‍त होने के बाद आरती को पूरे घर में घुमाया जाता है और ऐसा माना जाता है कि जलते हुए कपूर से सब प्रकार की बुरी शक्तियॉं समाप्‍त हो जाती हैं, सब चीजें सुगन्धित हो जाती हैं, और कपूर की खुशबू से देवी देवताऐं भी प्रसन्‍न हो जाते हैं ।

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दाह संस्‍कार
जब किसी हिन्‍दू की मृत्‍यु होती हैं तो दाह संस्‍कार किया जाता है, वे दफनाते नहीं हैं । यह केवल खर्चे के लिए नहीं होता क्‍योंकि कभी कभी देह को जलाने में जो लकडी प्रयोग होती है वह महंगी होती है । दाह संस्‍कार हमारे वायुमंडल के लिए बेहतर होता है (दो अर्थी शब्‍दों को क्षमा करें!), और पर्यावरण के अनुकूल होता है, और धरती को उन सब रसायनिक पदार्थों से बचाता है जो कि शरीर के संलेपन में प्रयोग होते हैं । क्‍योंक‍ि कोई कब्र नहीं है जहॉं आप जा सकें तो आपके प्रियजन आपके विचारों में आ कर आपसे मिल सकते हैं, कहीं भी, कभी भी !

अंत्‍येष्टि के बाद स्‍वच्‍छता
जब कोई दाह संस्‍कार के दौरान शरीर के समीप गया हो तो ऐसा बताया जाता है कि घर आते ही सबसे पहले उसे अच्‍छी प्रकार स्‍नान करना है फिर अपने कपडे, कपडे धोने वाली मशीन में या एक बाल्‍टी में धोने के लिए डालने हैं और साफ कपडे पहनने होते हैं । इससे नकारात्‍मक ऊर्जा, भौतिक या सूक्ष्‍म, जो कि दाह संस्‍कार के दौरान हमने ग्रहण कर ली थी, उससे छुटकारा पाने में मदद मिलती है ।

दाह संस्‍कार के बाद
सभी समीप के सम्‍बन्धियों को 13 दिनों त‍क घर के अंदर रहना होता है । ऐसा धार्मिक कारणों से नहीं होता, लेकिन जैसा कि हमने सीखा है, उन्‍हें कोरांटीन में रखा जाता है क्‍योंकि जिसकी मृत्‍यु हुई है हो सकता है उसको कोई संक्रामक बीमारी हो ।
उसके बाद राख को किसी चुनींदा नदी में बहाया जाता है, आमतौर पर भारत में गंगा नदी में । इसक उद्देश्‍य है बहाव के साथ चलना और परमात्‍मा की ओर लौटना । यह ऐसे ही है जैसे आत्‍मा एक नदी की तरह है जो कि परमात्‍मा सागर में समा जाती है ।

सुबह का सूरज
सुबह का एक बहुत प्रसिद्ध रिवाज है जिसमें एक बर्तन में पानी भरा जाता है और उस पानी को सूर्य की और उडेला जाता है । जब ऐसा किया जाता है तो सूरज की ओर देखते हुए स्‍तुति के गीत गाए जाते हैं । इस प्रकार जब कोई सूरज की ओर देखता है, और सुबह का सूरज ऑंखों के लिए ब‍हुत लाभदायक होता है; यह विटामिन डी प्रदान करता है, बेहतर नींद और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है और हड्डियॉं मजबूत करता है और कैंसर की रोकथाम करता है । इस प्रकार दिन का आरम्‍भ आभार व्‍यक्‍त करने से होता है ।

ओम का जाप
ओम का जाप करने के बहुत फायदे हैं । पश्‍चिमी लोगों ने भी इस अभ्‍यास को पूरे विश्‍वास से करना आरम्‍भ कर दिया है । ओम का जाप करने से सेहत पर बहुत अच्‍छा प्रभाव पडता है, रक्‍तचाप कम करता है, साइनस को साफ करता है और हृदय की धडकन को सही करता है । ओम का जाप करने से हमारे आसपास का वातावरण शुद्ध होता है । इससे हमारी एकाग्रता बढती है, और यह हमारे मन और हृदय को विश्राम देता है । ओम का जाप करने से बहुत फायदे होते हैं ।

जूते उतारना
घर में अंदर जाने से पहले और पवित्र स्‍थानों में प्रवेश से पहले जूते उतारने का चलन भारत में बहुत सामान्‍य है । जूते ना केवल धूल लाते हैं बल्कि बुरी ऊर्जा भी ।
जूते का चमडा शरीर के चमडे का भी प्रतीकात्‍मक है, और अहंकार का भी , जिसे हमें घर में और पूजा स्‍थलों में प्रवेश के पूर्व निकालने की आवश्‍यकता है । भगवान के सामने और हमारे प्रियजनों के सामने अहंकार का कोई स्‍थान नहीं हैं । हमें नम्रता का आवरण ओढकर प्रवेश करना चाहिए ।

चॉंदी की बिछिया
क्‍या आप जानते हैं कि चॉंदी की बिछिया पहनने से आप सदा शांत रहेंगे? ऐसा माना जाता है कि चॉंदी की बिछिया (सोने या तॉंबे की नहीं) धरती से ऊर्जा को लेकर पूरे शरीर तक पहुँचा देती है और जिससे शरीर को ऊर्जावान बना देती है । जिसके लिए अवश्‍य ही आपको जमीन पर नंगे पॉंव चलना होगा ।

संयुक्‍त परिवार
संयुक्‍त परिवार का होना वरदान हो सकता है या अभिशाप भी … यह सत्‍य है । लेकिन संयुक्‍त परिवार रखने का इरादा केवल धन को परिवार में रखने का नहीं था, लेकिन एक दूसरे को प्रेम और सहारा देने से था ताकि इससे हर प्रकार के दबाव का सामना करने में मदद मिले । आत्‍मनिर्भरता के नाम पर बहुत सी समस्‍याऐं पैदा हो गई हैं, बच्‍चे, स‍हयोग और आत्‍मनिर्भरता की कला का वि‍कास करे बिना ही घर छोड देते हैं ।

घर वालों की पसंद से या अरेन्‍जड मैरिज
मां बाप की मर्जी से शादी करने के सकारात्‍मक और नकारात्‍मक दोनों ही पहलू हैं । लेकिन यह कह सकते हैं कि अरेन्‍जड मैरिज करने का इरादा दूल्‍हा और दूल्‍हन के लिए बेहतरीन जोडी ढूँढने से था । उनकी जन्‍मपत्रियॉं मिलाई जाती हैं, ज्‍योतिष के साथ ही उनका धर्म और जाति आदि भी मिलाई जाती हैं, अपने बच्‍चों के लिए अनुकूल जोडी ढूँढने के लिए मातपिता पूरा प्रयास करते हैं ।

शालीन कपडे
अभी तक भी औरतें शालीन कपडे पहनती थी । शायद हौलीवुड, बौलीवुड और टीवी धारावाहिकों में जिस प्रकार के कपडे पहनते हैं तो ऐसा लगता है कि सभी को ऐसे वस्‍त्र पहनने की अनुमति प्राप्‍त हो गई हो । तो, चाहे शिष्‍ट साडी हो या सलवार कमीज हो, ये वस्‍त्र शरीर को आदर देने के लिए बनाऐ गये थे, और बहुत सभ्‍य भाव से इनको धारण किया जाता था ।

साफ सफाई
भारत में य‍ह रिवाज है कि जब तक स्‍नान नहीं किया है तब तक रसोईघर में प्रवेश नहीं कर सकते और कहीं कहीं तो तब तक नहीं जब तक कि सुबह की पूजा नहीं की है । ऐसी मान्‍यता है कि जब तक कोई भी कर्म सफल नहीं होगा जब तक सुबह की साफ सफाई और स्‍नान नहीं किया है । और बाल कटाने के बाद भी स्‍नान करने की सलाह दी जाती है ।

बालों की चोटी बनाना
भारत में अक्‍सर आदमी और औरत दोनों को ही बालों की चोटी बनाऐ हुए देखा जाता है । यह सदा फैशनएबुल नही लगता, लेकिन लगता है उन्‍हें एक दो उन बातों के बारे में मालूम है जिसके बारे में हम नहीं जानते । क्‍या आप जानते हैं कि बालों की चोटी बनाने से दिमाग की कुछ नसों पर दबाव पडता हैं? जिससे दिमाग स्थिर और शक्तिशाली बनता है ।

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घरों और कारों पर निशानियॉं और संकेत
भारतीय परंपरा में घरों के प्रवेश द्वार पर बहुत से चिन्‍ह लगाऐ जाते हैं, इन बहुत से चिन्‍हों और संकेतों के अनगिनत सकारात्‍मक अर्थ होते हैं । उदाहरण के लिए, ओम का चिन्‍ह, जिससे भाग्‍य आता है । ऐसी मान्‍यता है कि चौखट पर नींबू और मिर्च लटकाने से बुरी नजर नहीं लगती । स्‍वास्‍तिका से अच्‍छा शगुन होता है । गणेश जी की मूर्ति से कहते से सभी विघ्‍न दूर हो जाते हैं । वास्‍तु शास्‍त्र, जो कि शिल्‍प विद्या का विज्ञान है, हमें चीजों को सही जगह पर रखने के लिए मदद करता है जिससे शुभ ऊर्जा आती है । ऐसा कह सकते हैं कि यह भारतीय फेंग शुई है ।

अतिथी देवो भव:
मेहमानों के लिए हरेक के घर में विशेष स्‍थान होता है । बहुत सी कहानियॉं हैं जहॉं अतिथीयों को खिलाने के लिए परिवार भूखा रहा । एक मेहमान के किस प्रकार का व्‍यवहार होता है, इससे तो बहुत से राज पल्‍टे हैं । एक मेहमान को देवता की तरह मानना यह बहुत आदरकारी परंपरा है… क्‍योंकि क्‍या मालूम कब भगवान आपके घर आकर आपका दरवाजा खटखटा दे!

भारतीय आहार
मैं सच में ऐसा मानती हूँ कि भारतीय भोजन सबसे बेहतरीन है!! ऐसा स्‍वाभाविक भी है क्‍योंकि मैं भारतीय शरीर में हूँ । एक वीगन और शाकाहारी होते हुए भी मेरे पास बहुत से विकल्‍प हैं और मैं इसके लिए आभारी हूँ । इतनी भिन्‍नता को देखकर मैं विस्‍मयाभिभूत हूँ । बहुत स्‍वादिष्‍ट होने के साथ ही यह भोजन बहुत स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक भी है क्‍योंकि इसमें हल्‍दी और अदरक और बहुत से ऐसे मसालों का प्रयोग होता है जिससे पचाने में सहायता मिलती है । निस्‍संदेह भारतीय पकवानों में बहुत शक्‍कर वाले और तैलीय व्‍यंजन भी होते हैं तो हमें थोडा सावधानी से खाना चाहिए । लेकिन आमतौर पर देखा जाऐ तो बहुत शानदार होता है और हमें अवश्‍य खा कर देखना चाहिए! विभिन्‍न प्रकार का भोजन होता है जैसे कई प्रकार की रोटी, थेपला, चीला, और भॉंप से पके हुए व्‍यंजन जैसे इडली और ढोकला और सव्जियॉं और टमाटर, इमली, काजू या दूसरी चटनीयों के साथ पकाई गई कई सब्जियॉं । चावल भी विभिन्‍न प्रकार का मिलता है, और व्‍यंजन स्‍थान के अनुसार बदलते रहते हैं ।

भारतीय साहित्‍य
आज तक के सबसे महान महाकाव्‍य महाभारत और रामायण भारत में लिखे गये थे । अगर आपको टीवी धाराव‍ाहिक के रूप में देखना है तो 300 से अधिक एपीसोड होंगे और प्रत्‍येक एपीसोड 20 से 25 मिनट का है । यह बहुत लम्‍बा समय है । ये महाकाव्‍य हमें बलिदान, निष्‍ठा, समर्पण और सत्‍यता के गुणों के महत्‍व के बारे में बताते हैं । और दोनो ही कहानियॉं हमें बुराई पर अच्‍छाई के बारे में बताते हैं ।
दूसरी भी बहुत सी किताबें हैं जिन्‍हें वेद कहा जाता है । वेद अर्थात ज्ञान । चार वेद होते हैं: ऋगवेद, जिसमें उनकी पौराणिक कथाओं की स्‍तुति लिखी है; सामवेद में मुख्‍य रूप से धार्मिक रस्‍मों के बारे में लिखा है; यर्जुवेद में धार्मिक रस्‍मों के बारे में निर्देश लिखे हैं; और अथर्वेद में दुश्‍मनों, जादूगरों और बीमारीयों के बारे में मंत्र लिखे हैं ।

सोने की अवस्‍थाऐं
पुरातन हिन्‍दू धर्म में सबसे बेहतरीन सोने की अवस्‍था पूर्व से पश्चिम होती है । जिसमें कि सिर पूर्व की ओर और पॉंव पश्चिम की ओर होते हैं । पूर्व दिशा की ओर सिर करके सोने से याददाश्‍त अच्‍छी होती है, एकाग्रता बढती है और सेहत अच्‍छी होती है ।

योग
आज के दिन कोई भी योग कर सकता है! 2014 में United Nations General Assembly में अर्न्‍तराष्‍ट्रीय योग दिवस की शुरूआत की गई, और अब इसे प्रति वर्ष 21 जून को मनाया जाता है । योगा से लोगों को प्रतिदिन के लिए साधारण और स्‍वास्‍थयवर्धक पद्धतियॉं अपनाने का सुअवसर मिला है । और आज संसार भारत की ओर केवल योग के लिए ही नहीं बल्कि अपनी सेहत को सुधारने के लिए आयुर्वेद जैसी पुरानी पद्धतियों के लिए भी आशा की नजर से देख रहा है ।

 

मेडिटेशन
मेडिटेशन के बहुत से प्रकार हैं और कम या अधिक उन सबका लक्ष्‍य शारीरिक, मानसिक, भावनात्‍मक, और आध्‍यात्मिक पहलूओं को फिर से संतुलन में लाना है । मेडिटेशन हमारे मन और आत्‍मा में शांति लाने में मददगार है, इसलिए मेडिटेशन और सचेत या माईंडफुल रहने का अभ्‍यास एकत्रीकरण से जुडा है । अब, हम में से हर कोई इस अभ्‍यास से लाभांवित हो सकता है ।
अब समय है… पारंपरिक पद्धतियों के मूल्‍य को जानने का और हमारे आधुनिक संसार और आधुनिक जीवन में उनके महत्‍व की कद्र करने का ।

Image by Vijay Dhankhar from Pixabay

 

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