अपनी आवश्यकताओं को कम करें, अपने लालच का त्याग करें (Reduce Your Need, Forsake Your Greed – in Hindi)

अपनी आवश्यकताओं को कम करें, अपने लालच का त्याग करें

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क्या हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि जिस प्रकार का विश्व आज है उसे निमार्ण करने में हमने भी भूमिका निभाई है? हरेक चयन जो हम करते हैं और हरेक खरीदारी जो हम करते हैं, तो मिलकर हम विश्व का निमार्ण करते हैं । सामूहिक रूप से हम सभी अपने गृह की स्थिति के लिए जिम्मेवार ( या, गैरजिम्मेवार!) हैं ।

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इन दिनों, जो चीज़ बिल्कुल सीधी साधी दिखती है असल में वह होती नहीं । सेब खरीदने का उदाहरण ही ले लीजिऐ । सेब की उप्तत्ति कहाँ हुई थी? क्या इसे संसार के दूसरे कोने से मंगवाया गया है? इस यातायात में कितना ईंधन खर्च हुआ? और इसका उत्पादन करने और इसे आप तक पहुँचाने में कितने घंटों की मेहनत लगी? क्या यह कीटनाशकों से भरा है या सेवन करने के लिए सुरक्षित है? या उपर के सभी पहलूओं से बेपरवाह होकर हम केवल सेब का सेवन कर लेते हैं?

Fantastic Dead Planet

 

चलिए दूसरा उदाहरण लेते हैं: चॉकलेट का । कोको की फलियाँ किसने तोड़ी? बाल मजदूरों को तो नहीं लगाया गया था? क्या मजदूरों को ईमानदारी से उनका पैसा दे दिया गया था? जिन किसानों ने फसल उगाई थी उन्हें उनका न्यायोचित हिस्सा मिला था? चॉकलेट बनाने के लिए दूध कहाँ से लाया गया? क्या वे ‘खुश गायें’ थी? क्या कम्पनियाँ नीतीपरक थी और उचित व्यापार कर रही थीं? चॉक्लेट को ढ़कने वाले कागज़ और अल्यूमिनियम का उत्पादन कहाँ और कैसे किया गया था?

अगर आपको लग रहा है कि मैं बात को बढ़ा चढ़ा कर कह रही हूँ तो हाँ, शायद मैं ऐसा ही कर रही हूँ, लेकिन ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि सबक सीख लिया जाऐ । जो कुछ भी खरीदते हो, अगर उस वस्तु के बारे में हम पता लगाऐं तो आप देखेंगे कि इसके घटक कई प्रक्रियाओं से गुज़रे हैं जो गृह के लिए और इसके लोगों के लिए फायदेमंद नहीं हैं और हो सकता है आपके द्वार पर आने से पहले इसने कई रूपों में बहुत बार विश्व का चक्कर लगाया हो ।

Space tree

उत्पादक निरंतर उत्पाद करते रहेंगे क्योंकि धन कमाना ही उनका मुख्य ध्येय है । लेकिन एक जागरूक उपभोग्ता होने के नाते मुझे अपने कर्मों के परिणाम के बारे में भी जागरूक रहना चाहिए । मुझे सुविचारित चयन करने चाहिऐं, ऐसा नहीं कि एक सनक में खरीद लिया या क्योंकि कोई वस्तु बहुत कम दाम में बेची जा रही थी तो जमा कर ली या बटोर कर रख ली ।

हर बार जब भी हम इस संसार से कुछ लेते हैं तो हम कर्मों की एक लम्बी श्रृंखला का हिस्सा बन रहे हैं । जैसे ही हम संसार से लेते हैं तो हम आपूर्ति/ आवश्यकता की श्रृंखला का हिस्सा बनते हैं । इससे उत्पाद बढ़ जाता है जिसका अर्थ है और अधिक स्रोतों का क्षीण होना और अपने गृह को और अधिक हानि पहुँचाना ।

असल में, हम में से हर कोई कुछ हद तक ओज़ोन परत के क्षीण होने के लिए या अपने गृह पर जारी विनाश के लिए जिम्मेवार है । संसार की समस्याओं के लिए हम केवल बड़े उत्पादकों को दोषी नहीं ठहरा सकते । वे हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति ही कर रहे हैं । किसी न किसी प्रकार से हम ही संसार में विध्वंस की लहर फैला रहे हैं ।

उत्तर बहुत साधारण है लेकिन आवश्यक नहीं कि आसान हो । हमें और अधिक जागरूक बनना होगा और स्वयं से सवाल पूछना है कि: वास्तव में हमें कितनी आवश्यकता है और कितना हम केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए ले रहे हैं? अगर हमें आवश्यकता नहीं तो हम उसे न खरीदें बेशक हम में खरीदने की क्षमता क्यों न हो । अपने घर में चारों ओर देखें, अपनी अलमारी और अपने फ्रिज में देखें । आप पाऐंगे कि आपके पास जितना कुछ उपलब्ध है उसका बहुत छोटा सा हिस्सा ही आपकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त है । अपने ओहदे को ऊँचा करने और अपने अहंकार की संतुष्टि के लिए अधिक वस्तुओं के लिए हमारा लालच और इच्छा ही असल में हमारे गृह का विनाश कर रही है ।

Monk with elephant in the forest .

भविष्य की हमारी पीढ़ीयाँ हमसे पूछेंगी कि हमने इतना विध्वंस कैसे किया? हम उन्हें क्या उत्तर देंगे?

अपनी आवश्यकताओं को कम करें, अपने लालच का त्याग करें, कम वस्तुऐं उपयोग करें और गृह के लिए सहानुभूति रखें । उन बच्चों और मजदूरों के लिए करूणा अपनाऐं जिन्होंने इस चॉक्लेट को आपके तालू तक पहुँचाने में और अधिक मेहनत की है! जानवरों के प्रति सहानुभूति अपनाऐं, जैसे कि गायों और मगरमच्छों के प्रति!

जब हम अपनी वृत्ति सम्भाल करने, चिंता करने और विचारशील साधारणता की बना लेते हैं तो हमारा हृदय हल्का हो जाता है और हमें बहुत अच्छा लगता है और खुशी अनुभव होती है । अगर हम में से हर कोई अपने तरीके से गृह के लिए कुछ करते हैं तो हो सकता है हमारा अस्तित्व यहाँ थोड़ा और बढ़ जाऐ । अगर हम ऐसे ही अपनी इच्छाओं और सनकों की पूर्ति में लगे रहे तो हमारा लालच ही एक दिन हमें उपभोग कर लेगा ।

अब समय है… दोबार सोचने का और कम चाहने का । अपने विवेक का उपयोग करें और जागरूक उपभोग्ता बनें । संसार और भविष्य की पीढ़ीयाँ इसके लिए आपका शुक्रिया अदा करेंगी ।

Mans Journey of the Soul

 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

 

 

 

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