अतुलनीय भारत II (Incredible India II – In Hindi)

अतुलनीय भारत II

यात्रा महत्वपूर्ण है – मंज़िल नहीं!

 

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भारत एक शानदार स्थान है! अगर इसमें ऊपर से नीचे, पूर्व से पश्चिम तक यात्रा करने के लिए आपने एक वर्ष भी लगा दिया तो वह पर्याप्त नहीं होगा । भारत में विभिन्न प्रकार की संस्कृतियाँ, मौसम और रंग हैं जिससे आप हर कुछ सौ मील के बाद आसानी से यह सोच कर धोखा खा सकते हैं कि आप दूसरे देश में हैं!

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यह लेख मैं उत्तर भारत के उत्तरांचल में अद्भुत हिमालय के पास से लिख रही हूँ । बहुत लम्बे और जटिल सफर के बाद यहाँ पहुँच कर बहुत अच्छा लग रहा है । मेरा यहाँ का विमान लगभग छूट ही गया था और मैं उसे इसलिए पकड़ पाई क्योंकि जो अगला विमान मुझे लेना था वह विलम्ब से चल रहा था ।

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उत्तराखंड का दूसरा नाम है देव भूमी! इसका कारण है कि हिन्दू यह मानते हैं कि स्वर्ग का आरम्भ यहीं से हुआ था । इसमें हिन्दुओं के चार मुख्य तीर्थ धाम भी है (चार धाम यात्रा) । यहाँ प्रकृति की अनछुई सुंदरता बहुत अद्भुत है, और इन तीर्थ धामों में अथाह आस्था और भक्ति के कारण यहाँ के वातावरण में ऊर्जा बहुत अधिक है ।

लहरदार पर्वत हरे और कभी न समाप्त होने वाले हैं । सुबह पंछियों का मधुर संगीत सुनकर आप उठते हैं । वे बहुत खुश और उन्नत प्रतीत होते हैं । वहाँ लगभग सभी प्रकार के फूल हैं (और कीड़े भी !!!) जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे । प्रचुर मात्रा में फलों के पेड़ों और सब्ज़ियों के पौधों से घाटी जीवंत और समृद्ध है ।

अभी तक हमने एक छोटी कार में तेरह घंटे व्यतीत किये थे – सड़क पर जो कि पहाड़ के एक हिस्से से सटी हुई थी । किसी की हिम्मत नहीं थी जो घाटी में झांक कर देखे क्योंकि वह बहुत गहरी थी । गंगा नदी सांप की भाँति सड़क के समानांतर बहती है । कम से कम यह साहस बहुत रोमांचकारी था । कई बार हम बारीश के कारण भूस्खलन से गिरी हुई चट्टानों से स्वयं को बचाते हुए वास्तव में सड़क के किनारे पर पहुँच जाते थे । कुछ सड़के बंद थी क्योंकि या तो कोई अवरूद्ध था या पूरी तरह से नष्ट हो चुकी थी! और तब हमने लंबा रास्ता लेने का निर्णय लिया और फिर दूसरा साहिसक अभियान आरम्भ हुआ! फिर हम और भी छोटी और संकीर्ण सड़को पर चल रहे थे- अब भी पहाड़ के किनारे पर – और ये धुंध और बरसात से ढके हुए थे । और साथ ही रात का अंधेरा और निरंतर भूस्खलन या चट्टानों के गिरने का भय… यह बिल्कुल एक साहसिक फ़िल्म की तरह था! इस समय हम समुंद्र तल से लगभग 3000 मीटर उपर थे ।

हमारा ड्राईवर मनोज बहुत अनुभवी और बेहद बहादुर था । ऐसा मालूम होता था कि उसे और उसकी कार को कुछ भी रोक नहीं सकता था । हम धीरे धीरे साहसपूर्वक चलते रहे । निरंतर 13 घंटे गाड़ी चलाने के बाद अंतत: मनोज ने कुछ बोला और कहा कि हम और आगे नहीं जा पाऐंगे । अगले कस्बे में हमें ठहरना होगा ।

दोस्तों ने फोन पर हमें ‘डिलक्स’ और ‘सुपर डिलक्स’ आवासों के बारे में बताया, जो कि डिलक्स के स्तर के आसपास भी नहीं थे । फिर हमने अपने अच्छे मित्र गूगल की सहायता ली और हमें बेड एंड ब्रेकफास्ट हॉटल मिल गया जो कि एक भारतीय विधवा माता चलाती थी । हमने उसे फोन किया और उसने हमारा स्वागत किया; भाग्य से उसके पास कुछ कमरे खाली थे । यह बहुत खूबसूरत गुलाबी और नीले रंग का घर था और हमारे बरामदे से पहाड़ों का 180 डिग्री का दृश्य देख सकते थे ।

उसका बेटा, लंबा और शिक्षित मृदुभाषी था जो कि बहुत उत्तम पश्चिमी लहज़े की अंग्रज़ी बोल रहा था । उसने अपने कुत्ते से और मुम्बई से आऐ हुए तीन मित्रों से हमारा परिचय करवाया । स्नान के लिए पहले मैं गई और मैंने खिड़की पर उड़ने वाली चींटीयों की लम्बी कतारें देखी । मैंने कहीं से सुन रखा था कि आप चींटीओं से बातें कर सकते हैं और आप उन्हें दूर जाने के लिए कह सकते हैं और वे चली जाऐंगी । तो मैंने सोचा मुझे कोशिश करनी चाहिए! मैंने चींटीओं से कहा, “हैलो, क्या कृपा आप यहाँ से जाने का कष्ट करेंगे? हमने बी एंड बी को किराए पर लिया है!!” मैंने स्नान किया और यह लो, मेरे स्नान करने के अंत तक अधिकर चींटीयाँ विदाई ले चुकी थी ।

मेरे स्नान के बाद हमने पाया कि मैंने सारा पानी प्रयोग कर लिया और दूसरों के लिए कुछ नहीं बचा!! तो बेटे ने ठंडे और गर्म पानी की एक एक बाल्टी हमें दी । अगली सुबह भी उन्होंने ऐसा ही किया!

धीरे धीरे हम फिर से भारत के अभ्यस्त हो रहे थे! इसकी गंध, शोर शराबा, साधनों का अभाव और निरूत्साहपूर्ण रवैया!

अगली सुबह 6:30 बजे तक सभी जग गऐ थे और बरामदे में पहुँच गए थे । हमने मेडीटेशन के बारे में बातचीत की और रूची के विभिन्न क्षेत्रों के बारे में बात की ।

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मनोज को चलने की जल्दी थी क्योंकि उसे वापसी का पूरा सफर एक ही दिन में तय करना था । हमने अपने स्वास्थ्यवर्धक फल और ताहीनी खाई और शीघ्र ही निकल पड़े और आख़िरकार दो और घंटों के बाद हम अपनी मंज़िल पर पहुँच गए । अब हम समुंद्र के तल से 4000 मीटर की ऊँचाई पर थे और नई जलवायु से अभ्यस्त होने में हमें समय लग रहा था । इतनी अधिक ऊँचाई पर होने के सभी अप्रिय आसार नज़र आने लगे थे ।

इस यात्रा पर बहुत से पाठ सीखे । परीक्षाऐं आ रही थी लेकिन समाधान भी आ रहे थे । उस रात संकरी सड़क पर कुछ घंटे हमने शांत रहने और ध्यान में बैठने का निर्णय लिया । जिससे हमारे में विश्वास पैदा हुआ और निश्चिंतता का आभास हुआ । मैंने स्वयं को पुन: याद दिलवाया कि मैं एक आत्मा हूँ और इसका परिणाम जैसा भी होगा बहुत लाभदायक होगा!

हम डरे नहीं, हम शांत और हल्के रहे ।

Woman working out doing yoga at the beach

ऐसे पलों में मेडिटेशन की शक्ति और आत्म अभिमानी स्मृति वास्तव में सुरक्षा की भावना पैदा करती है । मुझे विश्वास था कि हमारा ध्यान रखा जाऐगा और ऐसा ही हुआ! यह स्थान बहुत दूरस्त है फिर भी वहाँ हमें इंटरनेट मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं था और यह अदभुत था कि हमें छोटे हॉटल में कमरा भी मिल गया!

हम इतने श्ष्टि और शरीफ़ ड्राईवर को पाकर कृतज्ञ थे जिसका एकमात्र लक्ष्य हमें सुरक्षित अपनी मंजिल पर पहुँचाना था ।

तो सब मिलाकर, यात्रा महत्वपूर्ण है केवल मंज़िल नहीं ।

अब समय है… यात्रा के प्रत्येक पल का आनंद लेने का!

ओम शांति

 

 

© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

 

 

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